भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 37, कुल 470 में से

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पृष्ठ 37

२० पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व ॥ गणपति की उत्पत्ति की कथा ॥ विराज ॥ रतं रत्त भारी । करुना बिचारी ॥ खियौ मात नक्खं । बियो संख लक्खं ॥ ५५ ॥ मिले एक दीहं । रमै काम सीहं ॥ इकं रिषि आयौ । दियौ काम चायौ ॥ ५६ ॥ खिज्यौ रिषि भारी । दियौ काम डारी ॥ भयौ पुच तब्बं । धजा मोद सब्बं ॥ ५७ ॥ सिरो माझधारी । गनेसं बिचारी ॥ खिजे तब्ब ईसं । भयौ रोम बीसं ॥ ५८ ॥ अबल्ला इकल्ली । वियौ पुर्ष झिल्ली ॥ उके डोर नहं । छन्यौ पुच बहं ॥ ५९ ॥ खिजी मात भारी । सरायं बिचारी ॥ करी जाकु ईसं । धस्यौ पुच सीसं ॥ ६० ॥ सवै कज्ज अग्गै । तुही नाम लग्गै ॥ कजानंद रूपं । गनेसं सधूपं ॥ ६१ ॥ इकं दंन्त दन्ती । विराजंत कंती ॥ सुभै दंत ऐसे । कविंदं प्रसंसै ॥ ६२ ॥ मनो भूमि धारी । बराहं उपारी ॥ इसी नट्ठ तेजं । कला सोम केजं ॥ ६३ ॥ नमो देव कहं । प्रजा ईस महं ॥ अखै भूत प्रेतं । तिजारी न घेतं ॥ ६४ ॥ सारसा, लंबी, जा; विघना, कचं, जा, मदं, अग्ने, जा, करः, स्यु, दीर, पृथ्रिराज, काव्य और कृते । इन में एक पृथीराज शब्द के स्थान में जो हमने पृथ्रिराज पाठ रक्खा है वह एक रासे की पुस्तक में है और चंद का ऐसा प्रयोग देख कर राजपूताने और बृज की गामीण भाषाओं से परिचित विद्वानों को कुछ आश्चर्य न होगा क्योंकि उनों ने ऐसे ही गजराज के स्थान में गज्ज्राज बोलते और लिखते लोगों को देखे और सुने होंगे । यह चंद की हिन्दी के देशी प्रसिद्ध नामक भेद का उदाहरण है ॥ २८ अन्य पुस्तकों में पाठान्तर यह हैं:—करुना, सात, नष्व, दियो, रिषि, अबल्लाइ, कल्ली, पुरुष, डोरं, धंधा, तुहि, दट्ठ, दैहै, देह, भगतं, लछी, लच्छी अर्थ, नयं, समती, पती, धरे, त्रिलोक और ईसा । इस रूपक के छंद का नाम चंद ने विराज कहा है परंतु उस का नामान्तर संखा नारी और उस का लक्षण यह है:—

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