भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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४१२ पृथ्वीराजरासो । [ नवाँ समय २८ सामंत सूर बिकसे सुमन । अरि दल तिल मत्तह मनिय ॥ छं० ॥ १३७ ॥ रु० ॥ ७२ ॥ दोनो सेनाओं का सामना होना और निशान बज उठना ॥ दूहा ॥ अनी बंधि प्रथिराज नृप । अनी पंच सुरतान ॥ मिली सेन दूनों निजरि । गज्जे गोम निसान ॥ छं० ॥ १३८ ॥ रु० ॥ ७३ ॥ हुसैन और तातार षां की सेनाओं की लड़ाई होना अंत को तांतारषां की फौज का भागना ॥ छंद भुजंगी ॥ जगे गोम नीसानं डूवान सेनं । धमकै धरा गान गज्जे सुगेंनं ॥ झरं पष्षरं घार ढालैं ढळक्की । घनं संन संनाह दूनों चमककी ॥ छं० ॥१३९॥ मिले मीर धीरं सुदिट्ठं दुआनं । पखं एक जीवं उभै सिंघ जानं ॥ दिसा बाह्यं साद हुस्सेन अनी । तिनं मज्झ सामंत सामंत मनी ॥ छं० ॥ १४० ॥ भरं जाम जद्दो सुमारू मचंह्नं । षलं गुज्जरं राम मंनै न संनं ॥ सजे सेन अनी सहस्सं चियारं । गुरु जुझ्झू भारी सुधारी करारं ॥ छं० ॥ १४१ ॥ सनंमुष्ष तत्तारे बीसं सहस्सं । घटा बंधि भद्दो बकै बीर रस्सं ॥ उडी सेन रेंनं रुक्यौ रस्थ सूरं । बकै दीन दीनं भरं अप्प दूरं ॥ छं० ॥ १४२ ॥ घनं बांन कंमान उड्डै कि जंगं । मनौं जोति षद्योत प्रस्तू निहंगं ॥ ढळक्की मिळी ढाल ढालं दूसूरं । मचानह सहं मनौ सिंघ पूरं ॥ छं० ॥ १४३ ॥ बजै धार धारं सुझारं करारं । परै गज्ज सुंडं ढरै सूर भारं ॥ चकै चक्र बज्जी खजग्गी सकत्ती । परै रुंड मुंडं परं श्रोनं रत्ती ॥ छं० ॥ १४४ ॥ मिन्नै षांन तत्तार हुस्सेन सेनं । बकै उंच बाचं सिरं सज्जिन गंनं ॥ छयं कुंडि कंधं पयं मंडि कन्ने । समं संमुषं टूव सूरं समन्ने ॥ छं० ॥ १४५ ॥ सहस्सं छयं कुंडि हुसेन सथ्यं । सयं तीन ताई बियं हिंदु तथ्यं ॥ प्रिति । साहन्न । सजे । दपिन । रतामि । रते । चहुवांन ॥ ७२ पाठान्तर-मध । प्रथिराज । अग । सजे । सामंत । राव । चंद चहुआन । कंकु । सथह । अनीय । समन । मत्तहि ॥ ७३ पाठान्तर-बधी । प्रथीराज । सुरतांन । दोनुं । गजे । निसांन ॥