पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 454, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ें[ ग्यारहवां समय ९ ] पृथ्वीराजरासो । ४४५ चित्ररेषा को सुलतान को वश करने का वर्णन ॥ कवित्त ॥ वसि कीनौ सुरतान । चंग जिस भ्रमै डोरि कर ॥ ज्यौं भावी बसि जाइ । बचन उद्योत बाल सुर ॥ ज्यौं वसि जीवन संन । प्रात वसि जेम क्रांस गुर ॥ ज्यौं वसि नाद कुरंग । वास वसि जेम मधुक्कर ॥ मछिजा सु मुक्ति सब वस्ति भय । मच्छिजा मच्छिज सुमति वसि ॥ एकांग एक अंदर सछल । रचै साछि सुरतान रसि ॥ छं० ॥ ३२ ॥ रु० ॥ १७ ॥ चित्ररेषा की कथा सुन कर कवि का आनंदित होना ॥ दो० ॥ पंथी पेम परेव जिस । सुमन मनोहर मिष्ट ॥ सुनत कथा संलुद्ध दृष्ट । अनंदिय मन इष्ट ॥ छं० ॥ ३३ ॥ रु० ॥ १८ ॥ * इति श्री कविचंद विरचिते पृथिराजरासके चित्ररेषा वर्णनं नाम एकादसो प्रस्ताव संपूर्णम् ॥ ११ ॥ १७ पाठान्तर—कीनौं । सुरतांन । भ्रमै । होई । मंत । क्रम । नद । वशि । मधुकर । सुमति । जांसि । मति । रहैं । सुरतांन । रस ॥ १८ पाठान्तर—यह । आनंदीय ॥
- यह दोहा Caulfield, Ms. में नहीं है, परन्तु वह हमारी सं० १६४७ और सं० १८५९ की पुस्तकों में है ॥