भारतकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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पृष्ठ 467

[ ग्यारहवां समय ९ ] पृथ्वीराजरासो । ४४५ चित्ररेषा को सुलतान को वश करने का वर्णन ॥ कवित्त ॥ वसि कीनौ सुरतान । चंग जिस भ्रमै डोरि कर ॥ ज्यौं भावी बसि जाइ । वचन उद्योत बाल सुर ॥ ज्यौं वसि जीवन संन । प्रात वसि जेम क्रांम गुर ॥ ज्यौं वसि नाद कुरंग । वास वसि जेम मधुक्कर ॥ मछिन्ना सु मुक्ति सब वस्सि भय । मच्छिा मच्छि सुमति वसि ॥ एकांग एक सुंदर सद्दल । रचै साचि सुरतान रसि ॥ छं० ॥ ३२ ॥ रु० ॥ १७ ॥ चित्ररेषा की कथा सुन कर कवि का आनंदित होना ॥ दो० ॥ पंथी पेम परेव जिस । सुमन मनोहर मिष्ट ॥ सुनत कथा संलख दृदृ । अनंदिय मन इष्ट ॥ छं० ॥ ३३ ॥ रु० ॥ १८ ॥ * इति श्री कविचंद विरचिते प्रथ्रिराजरासके चित्ररेषा वर्णनं नाम एकादसो प्रस्ताव संपूर्णम् ॥ ११ ॥ १७ पाठान्तर—कीनौँ । सुरतांन । भ्रुमै । होई । मंत । क्रम । नद । वशि । मधुकर । सुमति । जांसि । मति । रहें । सुरतांन । रस ॥ १८ पाठान्तर—यह । आनंदीय ॥

  • यह दोहा Caulfield, Ms. में नहीं है, परन्तु वह हमारी सं० १६४७ और सं० १८५८ की पुस्तकों में है ॥