पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 84, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ेंआदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । ७३ ॥ बीसलदेवजी का मृगया से बाहुरना एक तलाव बनाने की आज्ञा देना और दरबार करना ॥ दूहा ॥ तब बाहुरि बीसल नृपति । मृगया खेलत बन्न ॥ देखि थान सर * उद्धरन । मतौ उपान्यौ मन्न ॥ छं० ॥ ३६३ ॥ रू० ॥ १७८ ॥ पद्धरी ॥ तब देखि नरिन्द अनूप ठाम । निर्झर गिरिन्द वन अभिराम ॥ बुद्धाय लिए मंची प्रधान । सर * रचै इहां पहुकर समान ॥ छं० ३६४ ॥ फरमाय † काम अप आय गेह । आनंद अंग उपज्यों अछेद ॥ बैठौ सिंहासन धम्म नंद । बीसल नरिन्द नर लोक इंद ॥ छं० ॥ ३६५ ॥ सिर छत्र पास दुय चमर ढार । अति रूप जानि अस्वनि कुमार ॥ आईय सु कुलि छत्तीस नाम । पावासर तोवर गौर राम ॥ छं० ॥ ३६६ ॥ हजूर लए राजन बुलाइ । तंबोलि दियो सनमुख्य चाइ ॥ पढि बंदि छंद बोले विरद । मुसकाय सीस नायौ नरिन्द ॥ छं० ॥ ३६७ ॥ सब सभा पूरि जैसैं नखित्त । चहुआन बीच जनु चंद रत्त ॥ सनमान करे सब दइय सीष । फिरि बंदी जन दीनी असीष ॥ छं० ॥ ३६८ ॥ निसि गई पंच पल ण्क जाम । राजन महल्ल ‡ प्रवेस ताम ॥ करपूर अगर मृगमद सु वास । सैंधे छिरकिक उत्तिम अवास ॥ छं० ॥ ३६६ ॥ रू० ॥ १७८ ॥ * यह बीसल का तालाब अब तक अजमेर के पास विद्यमान है । उस के किनारे पर जहांगीर बादशाह ने एक महल बनाया था कि जिस में उस ने इंगलिस्तान के बादशाह जेम्स पहिले के एलची से मुलाक़ात कियी थी । इस टिप्पण को हमने इस तालाब के किनारे पर खड़े होकर लिखी है । यदि कोई पुरातत्ववेत्ता इस तड़ाग की वर्त्तमान दशा अपनी आंख से देखे तो उस को बड़ा शोक और आश्चर्य होगा कि अंग्रेज सरकार के राज्य समय में ऐसे प्राचीन स्थलों के जीर्णोद्धार राज-कोष के द्रव्य से होता है परंतु रेलवाले अपनी रेल इस पर दौड़ा २ कर उस को छिन्न भिन्न कर डालते हैं कि पांच सात वर्ष पीछे वह समूल नष्ट हो जायगा। हमारी सम्मति में यह विषय पुरातत्ववेत्ता विद्वानों और समस्त भारतप्रजा को सरकार हिन्द की सेवा में मिमोरियल करने जैसा है कि जिस से यह ऐतिहासिक चिन्ह यथास्थित बना रहे। † यह भी हिन्दी शब्द है संस्कृत स्फुरितम् अथवा स्फूर्तिः = स्फुरणे, मनसः कल्पनायाम् से ॥ ‡ यह भी हिन्दी है संस्कृत महल्ल = अंतःपुर inner appartments, palace. और मह- ल्लिकः = अंतःपुर रक्षक से ॥ १७८ पाठान्तरः-नृपति । वन । यांन । मतौ । मन ॥ १७९ पाठान्तर :-नरिंद । निझर । नर्झरन । गिरंद । अभिराम । बुलाय । लये । रचो । समानं । बैठो । सुसिंघासन । धर्म । नरिंद । समीप । दोय । जानि । अश्वनि । आदय । कुली । छतीस । ताम । पावा- सिर । तूंवरं । बुलाय । बुलाहि । दीयो । सनमुख । चाहि । चाय । छंद । वंदि । विरद । नाम्यो । जैसें । चहुवान । सनमान । दईय । जांम । राजन । धाम । कर्पूर । सोंधे । छिरकि । उत्तम ॥