भारतकोश
पृथ्वीराजविजय महाकाव्यम् (कवि जयानक - अजमेर चौहान साम्राज्य एवं सम्राट् पृथ्वीराज इतिहास)

पृथ्वीराजविजय महाकाव्यम् (कवि जयानक - अजमेर चौहान साम्राज्य एवं सम्राट् पृथ्वीराज इतिहास)

Prithvirajavijaya Mahakavya of Jayanaka with Commentary

कश्मीरी कवि जयानक (टीकाकार: जोनरराज) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 308, कुल 330 में से

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एकादशः सर्गः . २६१ पूर्वोक्तस्य श्लोकस्य हेतुमतोयं श्लोको हेतुत्वेन व्याख्येय इति भद्रम् ॥ (l.19) 105. श्रीश्रीकण्ठचरित्रकाव्यविवृतौ विश्रस्य निश्वस्य च च्छायाभाजि. किरातकाव्यविवृतौ विश्रम्य रम्य(l.20)श्रियि . पृथ्वीराजजयाख्यकाव्यविवृतौ संवेशमिच्छाम्यहं शास्त्रक्षोदजखेद[मेदु]रमतिर्ज्योत्स्ना(l.21)भिधो लावणः ॥. श्रीलोलराजसुतपण्डितभट्टनोन- राजात्मजो विवरणेन स जो[नराजः] . र्गे दशान्त्यमकरोत्सुखमत्र पृथ्वी- राजाख्यराजविजयाभिधकाव्यराजे ॥¹


1 Ms. ॥ प***** (l,23*).

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