पृथ्वीराजविजय महाकाव्यम् (कवि जयानक - अजमेर चौहान साम्राज्य एवं सम्राट् पृथ्वीराज इतिहास)
Prithvirajavijaya Mahakavya of Jayanaka with Commentary
कश्मीरी कवि जयानक (टीकाकार: जोनरराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें"करभो नूनं दृष्टो यतो निर्निमेषत्व(l.7)मद्गणां जातमन्थाचि निमेषसुखं" "लभेत . उष्ट्रोदर्शनीय इति प्रसिद्धिः . अतो हस्तौ दृष्टेः पिधानत्वं(l.8) नीत्वा" "बनदेवता राजानमपि द्रष्टूं न प्रापुः ॥ २२." Aha! Look at the commentary: "बनदेवता राजानमपि द्रष्टुं न प्रापुः ॥ २२." "वनदेवता राजानमपि द्रष्टुं न प्रापुः"! So in verse 22: "द्रष्टुं नरेन्द्रमपि नापुः + अरण्यदेव्यः"!! YES! "अरण्यदेव्यः" (the forest goddesses)! "नापुः" + "अरण्यदेव्यः" = "नापुररण्यदेव्यः" (or "नापुररण्यदेव्यः" as printed)! And in Verse 23: "प्रासादमून्नतमकारयदप्यररण्ये ॥" (or "अप्यरण्ये") Commentary: "स राजा वने प्रासादम(l.11)कारयत्" -> "वने" = "अरण्ये"! So in verse 23 it is "अरण्ये"! Now look at Verse 22