भारतकोश
रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)

DevanagariHindipublished735 पृष्ठ

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( ४ )

अब इस समय तो कामधेनु पाताल में वरुणदेव के यज्ञ में आहुति की सामग्री देने के लिए गयी है। उस लोक के द्वारों पर बड़े-बड़े विषधर सर्प रखवाली कर रहे हैं। अतः इस समय उसका दर्शन दुर्लभ है। अतः तुम उसकी पुत्री नन्दिनी गौ को ही उसकी प्रतिनिधि समझकर रानी के साथ शुद्ध मन से सेवा करो। इधर वसिष्ठजी यह कह ही रहे थे कि सुलक्षणा नन्दिनी वन से लौटकर आ पहुँची। अपना बछड़ा देखते ही उसके स्तनों से गरम-गरम दूध टपकने लगा। नन्दिनी के खुर से उड़ी धूल के लगने से राजा वैसे ही पवित्र हो गये जैसे किसी तीर्थ में स्नान करके लौटे हों। शकुन के जानने वाले वसिष्ठ जी दिलीप से बोले—राजन्, तुम्हारा मनोरथ शीघ्र ही पूर्ण होगा क्योंकि यह नन्दिनी नाम लेते ही आ पहुँची है। तुम कन्द, मूल, फल खाते हुए इसकी सेवा करो—जब यह चले तब तुम भी इसके पीछे-पीछे चलना, जब खड़ी हो जाय तब तुम भी खड़े हो जाना, जब यह बैठे तब तुम भी बैठ जाना और जब यह पानी पीने लगे तभी तुम भी पानी पीना। तुम्हारी वधू सुदक्षिणा को चाहिए कि वह नित्य प्रातःकाल बड़ी भक्ति से इसकी पूजा किया करे और जब यह वन को जाने लगे तब यह तपोवन के बाड़े तक उसके पीछे-पीछे जाय और सायंकाल लौटते समय वहीं से अगवानी करके उसे आश्रम में ले आये। जब तक यह गौ प्रसन्न न हो जाय तब तक तुम इसकी इसी प्रकार सेवा करते रहो। ईश्वर करे तुम्हें कोई बाधा न हो और जिस प्रकार तुम अपने पिता के सुयोग्य पुत्र हो वैसे ही तुम्हें भी सुयोग्य पुत्र प्राप्त हो। राजा ने बड़ी नम्रता से वसिष्ठजी से कहा कि हम ऐसा ही करेंगे। अनन्तर उन्होंने तथा उनकी पत्नी ने गुरुजी से इस व्रतपालन की आज्ञा ली। रात अधिक हो चली थी अतः वसिष्ठजी ने राजा के व्रत के योग्य कन्द-मूल के भोजन और कुश की चटाई का प्रबन्ध किया। वसिष्ठजी ने जो पर्णकुटी बनायी उसी में राजा दिलीप ने ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए रानी सुदक्षिणा के साथ कुश की चटाई पर सोकर रात बितायी।

द्वितीय सर्ग

रात में पर्णशाला के अन्दर विश्राम कर लेने के बाद प्रातःकाल प्रजापालक राजा दिलीप ने वसिष्ठजी की नवप्रसूता उस नन्दिनी गौ को वन में चराने के लिए बन्धन से खोल दिया, जिसकी पूजा रानी सुदक्षिणा ने चन्दन एवं माला से