भारतकोश
रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)

DevanagariHindipublished735 पृष्ठ

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( ६ )

राजा ने देखा कि उसके ऊपर शेर बैठा है और नन्दिनी कातर होकर उसकी ओर देख रही है। यह देखते ही राजा ने शेर को मारने के लिए तरकस से बाण निकालकर उसपर प्रहार करना ही चाहा कि उनका हाथ रुक गया और वे चित्रलिखित से निःस्तब्ध हो गये। बाद अपने पुरुषार्थ को व्यर्थ समझकर आश्चर्य में पड़े हुए और मन्त्र एवं औषध के बल से शक्तिक्षीण सांप के समान भीतर ही भीतर छटपटाते हुए राजा को देखकर मनुष्य की वाणी में शेर ने हँसते हुए कहा—राजन् ! मुझे मारने के लिए तेरा प्रयास व्यर्थ है, मैं भगवान् शङ्कर का सेवक हूँ, जो तुम्हारे भी मान्य हैं। एक बार जङ्गली हाथियों ने इन देवदारु वृक्षों के वल्कल को खुजली शान्त करने के अपने कपोलस्थल की रगड़ से छुड़ा दिया था, जिसे देखकर पार्वतीजी को बड़ा ही दुःख हुआ, क्योंकि उन्होंने इन्हें अपने पुत्र के समान पाला था। उसी समय से शिवाजी ने मुझे इसकी रखवारी के लिए नियुक्त कर आदेश दिया कि जो जन्तु तुम्हारे समीप आ जाय, उसे खाकर तुम अपना निर्वाह करना। अतः मैं इसे खाऊँगा। तुम लाज छोड़कर लौट जाओ, तुमने गुरुभक्ति का प्रदर्शन कर दिया, जो कार्य अशक्य है, उसमें किसी का दोष नहीं। यह सुनकर राजा ने अपनी अपमान भावना को ढीला कर दिया और वे बोले—हे मृगेन्द्र ! शिवजी तो मेरे मान्य हैं ही, पर गुरु की यह गाय भी उपेक्षणीय नहीं है, इसका छोटा बछड़ा दूध पीने के लिए उत्सुक होगा। अतः मुझे आप खाकर अपनी क्षुधानिवृत्ति कीजिए और इसे छोड़ दीजिए।

यह सुनकर वह शेर मुस्कराकर दिलीप से पुनः कहा—राजन् ! तुम मेरे विचार से बड़े विवेकशून्य मालूम पड़ते हो, क्योंकि एक क्षुद्र गौ के लिए इतना बड़ा साम्राज्य, नयी अवस्था एवं सुन्दर शरीर का त्याग करना चाहते हो। तुम्हारी कृपा से एक नन्दिनी मात्र का कल्याण होगा, यदि तुम जीते रहोगे तो अनेक प्रजाओं का पिता के समान निरन्तर पालन करते रहोगे। यदि गुरु से डरते हो तो अधिक दूध देनेवाली अनेक गौओं को देकर उनका क्रोध शान्त कर सकते हो। अतः अपने शरीर का त्याग न करो, इस पार्थिव स्वर्ग का भोग भोगो। यह कहकर सिंह के मौन हो जाने पर दिलीप ने कहा—मृगराज ! नाश से रक्षा करना क्षत्रिय का प्रमुख कर्त्तव्य है, उसके विरुद्ध प्राण धारण से क्या लाभ है ? गुरुजी के क्रोध की शान्ति, अन्य गायों के दान से सम्भव नहीं, इस नन्दिनी को कामधेनु के समान समझो, इस पर तो तुम्हारा आक्रमण