रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)
Raghuvamsham of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)
पृष्ठ 267, कुल 735 में से
संदर्भ में पढ़ें२०८ | रघुवंशमहाकाव्ये
हस्तश्च कलापार्थाः कचात्परे' इत्यमरः। तावदालोकमागंप्राप्तिपर्यन्तं बद्धं बन्धनार्थं न सम्भावितो न चिन्तित एव।
**भाषार्थ—**अज को देखने के लिए झरोखों पर शीघ्रता से जाती हुई किसी स्त्री का केश खुल गया, जल्दी में जूड़ा बांधने की भी उसे सूधि नहीं रही। वह उसे हाथ में पकड़े ही खिड़की पर पहुँच गई। केश पाश ढीले पड़ जाने से उसमें गूंथे हुए पुष्प बराबर नीचे गिरते जाते थे ॥ ६ ॥
प्रसाधिकालम्बितमग्रपादमाक्षिप्य काचिद्द्रवरागमेव ।
उत्सृष्टलीलागतिरागवाक्षादलक्तकाङ्कां पदवीं ततान ॥ ७ ॥
**अन्वयः—**काचित् प्रसाधिकालम्बितं द्रवरागं एव अग्रपादम् आक्षिप्य उत्सृष्ट लीलागतिः सती आगवाक्षात् अलक्तकाङ्कां पदवीं ततान ।
प्रसाधिकेति । काचित् प्रसाधिकयालङ्कर्त्र्या लम्बितं रञ्जनार्थं धृतं द्रवरागमेवार्द्रालक्तकमेव अग्रश्चासौ पादश्चेत्यग्रपाद इति कर्मधारयसमासः । "हस्ताग्राग्रहस्यादयो गुणगुणिनोर्भेदाभेदाभ्याम्" इति वामनः । तमाक्षिप्याकृष्य उत्सृष्टलीलागतिस्त्यक्तमन्दगमना सती आगवाक्षाद्गवाक्षपर्यन्तं पदवीं पन्थानमलक्तकाङ्कां लाक्षारागचिह्नां ततान विस्तारयामास ।
**भाषार्थ—**एक स्त्री शृङ्गार करने वाली अपनी दासी से पैरों में महावर लगवा रही थी उसी समय अज के आने की कल-कल शब्द को सुनकर शृङ्गार करने वाली के हाथों से गीले महावर वाले पैरों को खींचकर झरोखे की ओर दौड़ पड़ी जिससे झरोखे तक उसके पैर के महावर का लाल २ चिह्न पड़ गया ।
विलोचनं दक्षिणमञ्जनेन सम्भाव्य तद्वञ्चितवामनेत्र ।
तथैव वातायनसन्निकर्षं ययौ शलाकामपरा वहन्ती ॥ ८ ॥
**अन्वयः—**अपरा दक्षिणं विलोचनं अञ्जनेन सम्भाव्य तद्वञ्चितवामनेत्रा सती तथा एव शलाकां वहन्ती वातायनसन्निकर्षं ययौ ।
विलोचनमिति । अपरा स्त्री दक्षिणं विलोचनमञ्जनेन सम्भाव्यालंकृत्य सम्भ्रमादिति भावः । तद्वञ्चितं तेनाञ्जनेन वर्जितं वामनेत्रं यस्याः सती तथैव शलाकां मञ्जनतूलिकां वहन्ती सती वातायनसन्निकर्षं गवाक्षसमीपं ययौ । दक्षिणग्रहणं संभ्रमाद्व्युत्क्रमकरणद्योतनार्थम् । सव्यं हि पूर्वं मनुष्या अञ्जते इति श्रुतेः ।
**भाषार्थ—**एक दूसरी स्त्री अपनी आंखों में अञ्जन लगा रही थी दाहिनी आँख में अञ्जन लगा कर अज को देखने की जल्दी में बाईं आँख में बिना अञ्जन लगाये ही हाथ में सलाई लिए हुए झरोखे के पास पहुँच गई ॥ ८ ॥