भारतकोश
रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)

DevanagariHindipublished735 पृष्ठ

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सप्तमः सर्गः २१५

भाषार्थ—वे दोनों एक दूसरे को कनखियों से देखते थे और आंखें चार होते ही लज्जा से अपनी-अपनी आंखों को संकुचित कर लेते थे इस प्रकार दोनों का यह लज्जा भरा संकोच देखने वालों को बड़ा ही सुन्दर लगता था।

प्रदक्षिणप्रक्रमणात्कृशानोरुदर्चिषस्तन्मिथुनं चकासे ।
मेरोरुपान्तेष्वथ वर्तमानमन्योन्यसंसक्तमहस्त्रियामम् ॥ २४ ॥

अन्वयः—तत् मिथुनम् उदर्चिषः कृशानोः प्रदक्षिणप्रक्रमणात् मेरोः उपान्तेषु वर्तमानम् अन्योन्यसंसक्तम् अहस्त्रियामम् इव चकासे ।

प्रदक्षिणेति । तन्मिथुनमुदर्चिष उन्नतज्वालस्य कृशानोर्वह्नेः प्रदक्षिणप्रक्रमणा त्प्रदक्षिणीकरणात् मेरोरुपान्तेषु समीपेपु वर्तमानमावर्तमानं मेरुं प्रदक्षिणीकुर्वदित्यर्थः । अन्योन्यसंसक्तं परस्परसंगतं मिथुनस्याप्येतद्विशेषणम् । अहश्च त्रियामा चाहस्त्रियामं रात्रिदिवमिव समाहारे द्वन्द्वैकवद्भावः । चकासे दिदीपे ।

भाषार्थ—जिस समय अज और इन्दुमती दोनों हवन से प्रदीप्त अग्नि की प्रदक्षिणा कर रहे थे। उस समय मालूम पड़ता था कि मानो दिन और रात एक साथ मिलकर सुमेरु पर्वत की प्रदक्षिणा कर रहे हैं ॥ २४ ॥

नितम्बगुर्वी गुरुणा प्रयुक्ता वधूर्विधातृप्रतिमेन तेन ।
चकार सा मत्तचकोरनेत्रा लज्जावती लाजविसर्गमग्नौ ॥ २५ ॥

अन्वयः—नितम्बगुर्वी मत्तचकोरनेत्रा लज्जावती सा वधूः विधातृप्रतिमेन तेन गुरुणा प्रयुक्ता ( सती ) अग्नौ लाजविसर्गं चकार ।

नितम्बेति । नितम्बेन गुर्वीलघ्वी । 'दुर्धरालघुनोर्गुर्वी' इति शाश्वतः । विधातृप्रतिमेन ब्रह्मतुल्येन तेन गुरुणा याजकेन प्रयुक्ता जुहुधीति नियुक्ता मत्त-चकोरस्येव नेत्रे यस्याः सा वधूरग्नौ लाजविसर्गं चकार ।

भाषार्थ—विशाल नितम्बवाली मदोन्मत्त चकोर के समान चञ्चल नेत्रवाली सलज्ज इन्दुमती ने ब्रह्मा के समान विद्वान् उस पुरोहित के कहने पर अग्नि में लावा का हवन किया ॥ २५ ॥

हविः शमीपल्लवलाजगन्धो पुण्यः कृशानोरुदियाय धूमः ।
कपोलसंसर्पिशिखः स तस्या मुहूर्तकर्णोत्पलतां प्रपेदे ॥ २६ ॥

अन्वयः—हविःशमीपल्लवलाजगन्धी पुण्यः धूमः कृशानोः उदियाय कपोल-संसर्पिशिखः ( सन् ) सः तस्याः मुहूर्तकर्णोत्पलतां प्रपेदे ।

हविरिति । हविष आज्यादेः शमीपल्लवानां लाजानां च गन्धोऽस्यास्तीति