रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)
Raghuvamsham of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२७० रघुवंशमहाकाव्ये
कहने लगी—) हे भगवन् ! मैंने इन्द्र के कहने से यह काम किया है, इसमें मेरा कुछ भी दोष नहीं है, इस विपरीत व्यवहार को आप क्षमा कीजिए। इस प्रकार उस अप्सरा की प्रार्थना सुनकर ऋषि ने जब तक तुम्हें स्वर्गीय पुष्प नहीं दिखाई पड़ेगा, तब तक तुम्हें पृथ्वी पर रहना ही पड़ेगा ऐसा कह कर उस अप्सरा पर अनुग्रह किया ॥ ८१ ॥
क्रथकैशिकवंशसंभवा तव भूत्वा महिषी चिराय सा ।
उपलब्धवती दिवश्च्युतं विवशा शापनिवृत्तिकारणम् ॥ ८२ ॥
अन्वयः—क्रथकैशिकवंशसंभवा सा तव महिषी भूत्वा चिराय दिवः च्युतं शापनिवृत्तिकारणम् उपलब्धवती सा विवशा अभूत् ।
क्रयेति । क्रथकैशिकानां राज्ञां वंशे संभवो यस्याः सा हरिणी तव महिष्यभिषिक्ता स्त्री । 'कृताभिषेका महिषी' इत्यमरः। भूत्वा चिराय दिवः स्वर्गच्युतं पतितं शापनिवृत्तिकारणं सुरपुष्परूपमुपलब्धवती । विवशा अभूदिति शेषः । मृतेत्यर्थः ।
भाषार्थ—वही अप्सरा विदर्भवंश में उत्पन्न होकर बहुत दिनों तक तुम्हारी पटरानी बनी रही। अब स्वर्ग से गिरे हुए शाप की निवृत्ति के कारण स्वर्गीय पुष्पमाला को देख कर वह शाप से मुक्त होकर स्वर्ग चली गई ॥ ८२ ॥
तदलं तदपायचिन्तया विपदुत्पत्तिमंतामुपस्थिता ।
वसुधेयमवेक्ष्यतां त्वया वसुमत्या हि नृपाः कलत्रिणः ॥ ८३ ॥
अन्वयः—तत् तदपायचिन्तया अलम् उत्पत्तिमन्तां विपद् उपस्थिता (अतः) त्वया इयं वसुधा अवेक्ष्यतां । हि नृपाः वसुमत्या कलत्रिणः भवन्ति ।
तदिति । ततस्मात्तस्या अपायचिन्तयालं तस्या मरणं न चिन्त्यमित्यर्थः । निषेधक्रियां प्रति करणत्वाच्चिन्तयेति तृतीया । कुतो न चिन्त्यमत आह—उत्पत्तिमतां जन्मवतां विपद्विपत्तिरुपस्थिता सिद्धा । 'जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च' इत्यर्थः । तथापि कलत्ररहितस्य किं जीवितेन तत्राह—त्वयेयं वसुधा भूमिरवेक्ष्यतां पाल्यताम् । हि यस्मान्नृपा वसुमत्या पृथिव्या कलत्रिणः कलत्रवन्तः अतो न शोचितव्यमित्यर्थः ।
भाषार्थ—इस कारण उसकी मृत्यु की चिन्ता करना व्यर्थ है क्योंकि जो जन्म लेता है वह एक न एक दिन मरता ही है । अतः आप शोक छोड़ कर सावधान हो पृथ्वी का पालन कीजिए, क्योंकि राजाओं की सच्ची सहधर्मिणी तो पृथ्वी ही है ॥ ८३ ॥