भारतकोश
रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)

DevanagariHindipublished735 पृष्ठ

पृष्ठ 366, कुल 735 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 366

नवमः सर्गः  ३०७

भाषार्थ—कुञ्जों में छिपे हुए सिंहों को मारने लिए राजा दशरथ ने बिजली की कड़क के समान तीव्र धनुष की प्रत्यञ्चा की टंकारों से व्याकुल कर दिया, मानों अपने आधिपत्य के सामने सिंहों का आधिपत्य वे सहन कर सके ॥ ६४ ॥

तान्हत्वा गजकुलबद्धतीव्रवैरान्काकुत्स्थः कुटिलनखाग्रलग्नमुक्तान्।
आत्मानं रणकृतकर्मणां गजानामानृण्यं गतमिव मार्गणैरमंस्त ॥ ६५ ॥

अन्वयः—काकुस्थः गजकुलबद्धतीव्रवैरान् कुटिलनखाग्रलग्नमुक्तान् तान् हत्वा आत्मानं रणकृतकर्मणां गजानाम् आनृण्यं मार्गणैः गतम् इव अमंस्त ।

तानिति । काकुत्स्थो दशरथः राजकुलेषु बद्धं तीव्रं वैरं यैस्तान् कुटिलेषु नखाग्रेषु लग्ना मुक्तगजकुम्भमौक्तिकानि येषां तान्सिहान्हत्वा आत्मानं रणेषु कृतकर्मणां कृतोपकाराणां गजानामानृणत्वं मार्गणैः शरैः । ‘मार्गणो याचके शरे’ इति विश्वः । गतं प्राप्तवन्तमिवामंस्त मेने ।

भाषार्थ—हाथियों ने संग्राम में राजा दशरथ के बहुत उपकार किये थे इसलिए उन्होंने बाणों से उनके रिपुभूत उन सिंहों को मारकर हाथियों का ऋण चुका दिया जिनके नुकीले टेढ़े अगले पञ्जों में तब गजमुक्तायें उलझी हुई थीं ॥ ६५ ॥

चमरान्परितः प्रवर्तिताश्वः क्वचिदाकर्णविकृष्टभल्लवर्षी।
नृपतीनिव तान्वियोज्य सद्यः सितबालव्यजनैर्जगाम शान्तिम् ॥ ६६ ॥

अन्वयः—क्वचित् चमरान् परितः प्रवर्तिताश्वः आकर्णविकृष्टभल्लवर्षी सः नृपतीन् इव तान् सितबालव्यजनैः वियोज्य सद्यः शान्ति जगाम ।

चमरानिति । क्वचिच्चमरान्परितः । “अभितः परितः समयानिकषाहा-प्रतियोगेऽपि” इत्यनेन द्वितीया । प्रवर्तिताश्वः प्रधाविताश्वः आकर्णविकृष्टभल्ला-निषुविशेषान्वर्षतीति तथोक्तः स नृपतीनिव तांश्चमरान्सितवालव्यजनैः शुभ्रचा-मरैर्वियोज्य विरहय्य सद्यः शान्तिं जगाम । शूराणां परकीयमैश्वर्यमेवासह्यं न तु जीवितमिति भावः । औपच्छन्दसिकं वृत्तम् ।

भाषार्थ—चामर मृगों के चारों ओर घोड़ों को दौड़ाते हुए और कान तक खींचकर भालाओं को बरसाने वाले राजा दशरथ ने उन मृगों की चंवरवाली पूंछें काट लीं, इससे उनको ऐसा सन्तोष हुआ मानों चंवरधारी राजाओं के चंवर ही उन्होंने छीन लिए हों । दशरथ को इस बात का बड़ा क्रोध था कि मेर एक छत्र राज्य करते हुए राजचिह्न चँवर को कैसे धारण कर सकते हैं ॥ ६६ ॥