रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)
Raghuvamsham of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ३१२ | रघुवंशमहाकाव्ये |
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**भाषार्थ—**हा पिताजी ! इस प्रकार श्रवणकुमार का करुण क्रन्दन सुनकर दुःखी होकर बेंतों के कुञ्जों में छिपे हुए उस करुण ध्वनि के उत्पत्ति स्थान को ढूंढते हुए राजा दशरथ ने देखा कि बेंत की झाड़ियों में बाणों से विद्ध घड़े पर झुका हुआ कोई मुनिकुमार पड़ा हुआ है उसे देखकर उनको ऐसा कष्ट हुआ मानों इन्हें ही बाण लग गया हो ॥ ७५ ॥
तेनावतीर्य तुरगात्प्रथितान्वयेन
पृष्टान्वयः स जलकुम्भनिषण्णदेहः ।
तस्मै द्विजेतरतपस्विसुतं स्खलद्भि-
रात्मानमक्षरपदैः कथयाम्बभूव ॥ ७६ ॥
**अन्वयः—**प्रथितान्वयेन तेन तुरगात् अवतीर्य पृष्टान्वयः जलकुम्भनिषण्ण-देहः सः तस्मै स्खलद्भिः अक्षरपदैः आत्मानं द्विजेतरतपस्विसुतम् कथयाम्बभूव ।
तेनेति। प्रथितान्वयेन प्रख्यातवंशेन । एतेन पापभीरुत्वं सूचितं । तेन राज्ञा तुरगादवतीर्य पृष्टान्वयी ब्रह्महत्याशङ्कया पृष्टकुलः जलकुम्भनिषण्णदेहः स मुनिपुत्रस्तस्मै राज्ञे स्खलद्भिः अशक्तिवशादर्धोच्चारितैरित्यर्थः । अक्षरप्रायैः पदैरक्षरपदैरात्मानं द्विजेतरश्चासौ तपस्विसुतश्च तं द्विजेतरतपस्विसुतं कथयाम्बभूव । न तावत्त्रैवर्णिक एवाहमस्मि किन्तु करणः ‘वैश्यात्तु करणः शूद्रायाम्’ इति याज्ञवल्क्यः कुतो ब्रह्महत्येत्यर्थः । तथा च रामायणे—‘‘ब्रह्महत्याकृतं पापं हृदयादपनीयताम् ॥ न द्विजातिरिरहं राजन्मा भूत्ते मनसो व्यथा । शूद्रायमस्मि वैश्येन जातो जनपदाधिप ॥’’
**भाषार्थ—**राजा दशरथ अत्यन्त पापभीरु थे इस लिए घोड़े से शीघ्र उतर कर उन्होने ब्रह्महत्या की आशंका से घड़े पर झुके हुए उस मुनिकुमार से पहले उसकी जाति और नाम पूछा, उसने भी उनका आशय समझ कर सड़खड़ाती वाणी से बताया कि मैं द्विज से भिन्न वैश्य पिता से शूद्रा माता से उत्पन्न करण संज्ञक मुनि कुमार हूँ । इसलिए राजा दशरथ अपने को ब्रह्महत्या से मुक्त समझे ॥ ७६ ॥
तच्चोदितः स तमनुद्धृतशल्यमेव
पित्रोः सकाशमवसन्नदृशोर्निनाय ।
ताभ्यां तयागतमुपेत्य तमेकपुत्र-
मज्ञानतः स्वचरितं नृपतिः शशंस ॥ ७७ ॥