भारतकोश
रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)

DevanagariHindipublished735 पृष्ठ

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नवमः सर्गः ३१५

भाषार्थ—हे मुने ! मुझे आज तक पुत्र के मुखकमल का दर्शन तक नहीं हुआ है इसलिए मैं आपके इस शाप को वरदान ही समझता हूँ क्योंकि इसी व्याज से मुझे पुत्र तो प्राप्त होगा । घास फूस इन्धन आदि से प्रदीप्त अग्नि जिस प्रकार भूमि को जलाता हुआ भी बीज अंकुरित होने के योग्य बनाकर भूमिका उपकार ही करता है उसी प्रकार आपका शाप भी सफल होने के लिए.मुझे पुत्र उत्पन्न करके मेरा उपकारक ही होगा ॥ ८० ॥

इत्थं गते गतघृणः किमयं विधत्तां
वध्यस्तवेत्यभिहितो वसुधाधिपेन ।
एधान्हुताशनवतः स मुनिर्ययाचे
पुत्रं परासुमनुगन्तुमनाः सदारः ॥ ८१ ॥

अन्वयः—इत्थम् गते, ( सति ) वसुधाधिपेन गतघृणः तव वध्यः अयम् किं विधत्ताम् ? इति अभिहितः सदारः सः मुनिः परासुम् पुत्रम् अनुगन्तुमनाः ( सन् ) हुताशनवतः एधान् ययाचे ।

इत्यमिति । इत्थं गते प्रवृत्ते सति वसुधाधिपेन राज्ञा गतघृणो निष्करुणः । हन्तृत्वान्निष्कृप इत्यर्थः । अत एव तव वध्यो वधार्होऽयं जनः अयमिति राज्ञो निर्वेदादनादरेण स्वात्मनिर्देशः । किं विधत्तामित्यभिहित उक्तः । मया किं विधेयमिति विज्ञापित इत्यर्थः । स मुनिः सदारः सभार्यः परासुं पुत्रमनुगन्तुं मनो यस्य सोऽनुगन्तुमनाः सन् । “तुं काममनसोरपिः” इति मकारलोपः । हुताशनवतः साग्नीनेधान्काष्ठानि ययाचे । न चात्रात्मघातदोषः । 'अनुष्ठानासमर्थस्य वानप्रस्थस्य जीर्यतः । भृग्वग्निजलसंपातं मरणं प्रविधीयते ) इत्युक्तेः ।

भाषार्थ—यह कहकर राजा दशरथ ने पुनः उनसे कहा—मैं तो इसी योग्य हूँ कि आप मेरा वध कर दें, अब आप मुझे क्या आज्ञा देते हैं ? यह सुनकर उस मुनि ने कहा कि अब मैं और मेरी स्त्री दोनों अपने प्रिय पुत्र के साथ ही मर जायेंगे, अतः हमारे लिए अग्नि और ईंधन जुटा दो ॥ ८१ ॥

प्राप्तानुकः सपदि शासनमस्य राजा
सम्पाद्य पातकविलुप्तधृतिर्निवृत्तः ।
अन्तर्निविष्टपदमात्मविनाशहेतुम्
शापं दधज्ज्वलनमौर्वमिवाम्बुराशिः ॥ ८२ ॥