भारतकोश
रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)

DevanagariHindipublished735 पृष्ठ

पृष्ठ 411, कुल 735 में से

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३५२ रघुवंशमहाकाव्ये

सपुष्पजलवर्षिभिः पुष्पसहितजलवर्षिभिर्घनैः सा मार्गसंस्क्रिया आशु विदधे विहिता। एतेन देवकार्यप्रवृत्तयोर्देवानुकूल्यं सूचितम् । भावार्थ—राजा दशरथ ने जब तक उन दोनों को नगर से बाहर जाने के लिए मार्ग सजाने की आज्ञा दी, तब तक वायु ने धूलि साफ कर दी, मेघों ने जल को छिड़कने का कार्य कर दिया और देवताओं ने आकाश से पुष्प वर्षा कर मार्ग की सजावट कर दी ॥ ३ ॥

तौ निदेशकरणोद्यतौ पितुर्धन्विनौ चरणयोर्निपेततुः । भूपतेरपि तयोः प्रवत्स्यतोर्नम्रयोरुपरि बाष्पविन्दवः ॥ ४ ॥

अन्वयः—निदेशकारणोद्यतौ धन्विनौ तौ पितुः चरणयोः निपेततुः भूपतेः अपि बाष्पविन्दवः प्रवस्यतोः तयोः उपरि (निपेतुः) । ताविति। निदेशकरणोद्यतौ पित्राज्ञाकरणोद्युक्तौ धन्विनौ धनुष्मन्तौ तौ कुमारौ पितुश्चरणयोर्निपेततुः। प्रणतावित्यर्थः। भूपतेरपि बाष्पविन्दवः प्रवत्स्यतोः प्रवासं करिष्यतोः अत एव नम्रयोः प्रणतयोः । “नमिकम्पि०” इति रप्रत्ययः । तयोरुपरि निपेततुः पतिताः । भावार्थ—पिता की आज्ञा का पालन करने के लिए प्रस्तुत और धनुष लिये हुए उन दोनों राजकुमारों ने अपने पिता के चरणों पर झुक कर प्रणाम किया और बाहर जाने के लिए उद्यत एवं अपने चरणों पर झुके हुए उन दोनों के ऊपर दशरथ जी की आंखों से आंसू के बूंद टपक पड़े ॥ ४ ॥

तौ पितुर्नयनजेन वारिणा किञ्चिदुक्षितशिखण्डकावुभौ । धन्विनौ तमृषिमन्वगच्छतां पौरदृष्टिकृतमार्गतोरणौ ॥ ५ ॥

अन्वयः—पितुः नयनजेन वारिणा किञ्चित् उक्षितशिखण्डकौ तौ उभौ पौर- दृष्टिकृतमार्गतोरणौ तं ऋषि अन्वगच्छताम् । ताविति। पितुर्नयनजेन वारिणा किञ्चिदुक्षितशिखण्डकावीषत्सिक्तचूडौ । 'शिखा चूडा शिखण्डः स्यात्' इत्यमरः । “शेषाद्विभाषा” इति कप्प्रत्ययः । धन्विनौ तावुभौ पौरदृष्टिभिः कृतानि मार्गतोरणानि सम्पाद्यानि कुवलयानि ययोस्तौ तथोक्तौ । सदृशो निरीक्ष्यमाणावित्यर्थः। तमृषिमन्वगच्छताम् । भावार्थ—राजा दशरथ के नेत्र से निःसृत जलबिन्दुओं से कुछ भीगे हुए काकपक्ष वाले धनुर्धारी वे दोनों राजकुमार विश्वामित्रजी के पीछे चले जा रहे थे, उस समय उठे हुए पुरवासियों की आंखें ऐसी दीखती थीं, मानों नेत्रों का तोरण मार्ग में सजाया गया हो ॥ ५ ॥