भारतकोश
रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)

DevanagariHindipublished735 पृष्ठ

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पृष्ठ 413
३५४रघुवंशमहाकाव्ये

योर्नामधेयसदृशं नामानुरूपं विचेष्टितमिव उदकोज्झन-कूलभेदनरूपव्यापार इव । समयोत्पन्नं चापलमपि शोभत इति भावः ।

भाषार्थ—बचपन के कारण लहरों के समान चंचलबाहु वाले उन दोनों राजकुमारों का चलना ऐसा सुन्दर लग रहा था, मानो वर्षार्ऋतु में उद्घ और भिद्य नामक दो नद लहराते इठलाते और तटों को तोड़ते हुए चले जा रहे हों ॥ ८ ॥

तौ बलातिबलयोः प्रभावतो विद्ययोः पथि मुनिप्रदिष्टयोः ।
मम्लतुर्न मणिकुट्टिमोचितौ मातृपार्श्वपरिवर्तिनाविव ॥ ९ ॥

अन्वयः—मणिकुट्टिमोचितौ तौ पथि मुनिप्रदिष्टयोः बलातिबलयोः विद्ययोः प्रभावतः सामर्थ्यान्मातृपार्श्वपरिवर्तिनौ इव न मम्लतुः ।

ताविति । मणिकुट्टिमोचितौ मणिबद्धभूमिसंचारोचितौ तौ मुनिप्रदिष्टयोः कौशिकेनोपदिष्टयोर्बलातिबलयोर्विद्ययोर्बलातिवलाख्ययोर्मन्त्रयोः प्रभावतः सामर्थ्यान्मातृपार्श्वपरिवर्तिनौ मातृसमीपवर्तिनाविव पथि न मम्लतुः । न म्लानावित्यर्थः । अत्र रामायणश्लोकः—'क्षुत्पिपासे न ते राम ! भविष्येते नरोत्तम ! बलामतिबलां चैव पठतः पथि राघव !' इति ।

भाषार्थ—मार्ग में विश्वामित्र जी ने उन्हें बला और अतिबला नाम की दो विद्यायें सिखा दीं, जिससे मार्ग में चलते हुए उन दोनों राजकुमारों को न तो थकान मालूम हो रही थी, न भूख प्यास ही लगती थी । उन्हें ऐसा सुख हो रहा था, मानों मणियों से जड़े हुए अपने भवनों में अपनी माताओं के आस-पास घूम रहे हों ॥ ६ ॥

पूर्ववृत्तकथितैः पुराविदः सानुजः पितृसखस्य राघवः ।
उह्यमान इव वाहनोचितः पादचारमपि न व्यभावयत् ॥ १० ॥

अन्वयः—वाहनोचितः सानुजः राघवः पुराविदः पितृसखस्य पूर्ववृत्तकथितैः उह्यमानः इव पादचारम् अपि न व्यभावयत् ।

पूर्वेति । वाहनोचितः सानुजो राघवः पुराविदः पूर्ववृत्ताभिज्ञस्य पितृसखस्य मुनेः पूर्ववृत्तकथितैः पुरावृत्तकथाभिरुह्यमान इव वाहनेन प्राप्यमाण इव । वहेर्घातोः कर्मणि शानच् । 'उह्यमानः' इत्यर्थे दीर्घादिरपपाठः दीर्घप्राप्त्यभावात् । पादचारमपि न व्यभावयन्न ज्ञातवान् ।

भाषार्थ—जो राम और लक्ष्मण हाथी, घोड़ा, रथ आदि वाहनों पर चढ़ कर चलते थे, उन्हें पैदल चलते हुए तनिक भी थकावट नहीं हुई, क्योंकि उनके पिता