भारतकोश
रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)

DevanagariHindipublished735 पृष्ठ

पृष्ठ 440, कुल 735 में से

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एकादशः सर्गः ३८१

तब तक मुझे अच्छा नहीं लगता जब तक तुझे मैं जीत न लूँ। क्योंकि अग्नि का प्रताप तभी प्रशंसनीय है जब वह समुद्र में भी वैसे ही भड़ककर जले जैसे सूखी घास के ढेर में जलता है ॥ ७५ ॥

विद्धि चात्तबलमोजसा हरेरैश्वरं धनुरभाजि यत्त्वया ।
खातमूलमनिलो नदीरयैः पातयत्यपि मृदुस्तटद्रुमम् ॥ ७६ ॥

**अन्वयः—**ऐश्वरं धनुं हरेः ओजसा आत्तबलं च विद्धि तत् त्वया अभाजि नदीरयैः खातमूलं तटद्रुमं मृदुः अपि अनिलः पातयति ।

विद्धीति । किंच ऐश्वरं धनुर्हरेर्विष्णोरोजसा बलेनात्तबलं हृतसारं च विद्धि यद्धनुस्त्वयाऽभाज्यभंक्षि । "भञ्जेश्च ण्विचि" इति विभाषया नलोपः । तथाहि नदीरयैः खातमूलमवदारितपादं तटद्रुमं मृदुरप्यनिलः पातयति । ततः शिशुरपि रौद्रं धनुरभाङ्क्षमिति मा गर्वीरिति भावः ।

**भाषार्थ—**शिवजी के जिस धनुष को तोड़कर तुम ऐंठ रहे हो उसकी शक्ति तो विष्णु ने पहले ही हर ली है। इसलिए उसे तोड़कर तुमने कोई वीरता का काम नहीं किया है, क्योंकि जिस वृक्ष की जड़ को नदी की प्रचण्ड धारा ने पहले ही खोखली कर दी हो उसे वायु के झोंके से ढहजाने में क्या देर लगती है ॥ ७६ ॥

तन्मदीयमिदमायुधं ज्यया सङ्गमय्य सशरं विकृष्यताम् ।
तिष्ठतु प्रधनमेवमप्यहं तुल्यबाहुतरसा जितस्त्वया ॥ ७७ ॥

**अन्वयः—**तत् मदीयं इदं आयुधं ज्यया संगमय्य सशरं विकृष्यतां प्रधनं तिष्ठतु एवमपि अहं तुल्यबाहुः तरसा त्वया जितः ।

तदिति । तत्तस्मान्मदीयमिदमायुधं कार्मुकं ज्यया सङ्गमय्य संयोज्य "ल्यपि लघुपूर्वात्" इति णेरयादेशः । सशरं यथा तथा त्वया विकृष्यताम् । प्रधनं रणस्तिष्ठतु । प्रधनं तावदास्तामित्यर्थः । 'प्रधनं मारणे रणे' इति विश्वः । एवमपि मद्धनुःकर्षणेऽप्यहं तुल्यबाहुतरसा समबाहुबलेन । 'रंहस्तरसी तु रयः स्यदः' इत्यमरः । त्वया जितः ।

**भाषार्थ—**देखो राम ! युद्ध तो पीछे होगा, पहले तुम मेरे इस धनुष पर डोरी चढ़ाकर इसे बाण के साथ खींचो तो सही, यदि तुम इतना भी कर लोगे तो मैं समझूंगा कि तुम मेरे ही समान बलवान् हो और मैं इतने से ही अपनी हार मानकर लौट जाऊंगा ॥ ७७ ॥

कातरोऽसि यदि वोद्गताचिषा तर्जिताः परशुधारया मम ।
ज्यानिघातकठिनाङ्‌गुलिवृत्तया बध्यतामभययाचनाञ्जलिः ॥ ७८ ॥

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