भारतकोश
रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)

DevanagariHindipublished735 पृष्ठ

पृष्ठ 449, कुल 735 में से

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पृष्ठ 449

३९० | रघुवंशमहाकाव्ये

तस्येति । क्रूरनिश्चया कैकेयी तस्य रामस्य कल्पितं सम्भृतमभिषेकस्य सम्भारमुपकरणं शोकोष्णैः पार्थिवाश्रुभिर्दूषयामास । स्वदुःखमूलेन राजशोकेन प्रतिबबन्धेत्यर्थः ।

**भाषार्थ—**निष्ठुर कैकेयी ने ऐसा कुचक्र चलाया कि रामको राज्याभिषेक की सारी तैयारी शोक से सन्तप्त राजा दशरथ की आसुओं से दूषित हो गयी । अर्थात् क्रूरकर्मा कैकेयी के कारण रोते हुए दशरथ ने राम के राज्याभिषेक को रोक दिया ॥ ४ ॥

सा किलाश्वासिता चण्डी भर्त्रा तत्संश्रुतौ वरौ ।
उद्ववामेन्द्रसिक्ता भूबिलमग्नाविवोरगौ ॥ ५ ॥

**अन्वयः—**चण्डी सा किल भर्त्रा आश्वासिता ( सती ) तत्संश्रुतौ वरौ इन्द्रसिक्ता भूः विलमग्नो उरगो इव उद्ववाम ।

सेति । चण्ड्यतिकोपना । 'चण्डस्त्वत्यन्तकोपनः' इत्यमरः । सा किल भर्त्राऽऽश्वासिताऽनुनीता सती तेन भर्त्रा संश्रुतौ प्रतिज्ञातौ वरौ इन्द्रेण मेघेेन सिक्ताभिवृष्टा । 'इन्द्रः फणिज्जके सान्द्रे घनकामनयोर्मदो' इति विश्वः । भूबिले वल्मीकादौ मग्नावुरगाविव उद्ववामोज्जगार ।

**भाषार्थ—**अत्यन्त क्रोधशीला उस कैकेयी ने राजा दशरथ द्वारा आश्वासन दिए जाने पर दो वर मांगे जिनके लिए वे पहले ही वचन दे चुके थे, वे दोनों वर कैकेयी के मुख से इस प्रकार निकले जिस प्रकार वर्षा से भीगी हुई पृथ्वो से बिल में घुसे दो सांप निकलते हों ॥ ५ ॥

तयोश्चतुर्दशैकेन रामं प्राव्राजयत्समाः ।
द्वितीयेन सुतस्यैच्छद्वैधव्यैकफलां श्रियम् ॥ ६ ॥

**अन्वयः—**सा तयोः एकेन रामं चतुर्दशसमाः प्राव्राजयत् । द्वितीयेन वरेण सुतस्य वैधव्यैकफलां श्रियम् ऐच्छत् ।

तयोरिति । सा तयोर्वरयोर्मध्ये एकेन वरेण रामं चतुर्दशसमाः संवत्सरान् । अत्यन्तसंयोगे द्वितीया । प्राव्राजयत्प्रावासयत् । द्वितीयेन वरेण सुतस्य भरतस्य वैधव्यैकफलां स्ववैधव्यमात्रफलां न तूपभोगफलामिति भावः । श्रियमैच्छदियेष ।

**भाषार्थ—**उन दोनों वरों में से कैकेयी ने एक वर तो यह मांगा कि चौदह वर्ष के लिए राम वन में चले जाय और दूसरा यह कि मेरे पुत्र भरत को राज्यलक्ष्मी मिले; किन्तु इसका एक मात्र फल यह हुआ कि कैकेयी विधवा हो गई किन्तु सुख नहीं पा सकी ॥ ६ ॥

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