भारतकोश
रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)

DevanagariHindipublished735 पृष्ठ

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द्वादशः सर्गः ४०१

मैथुन की इच्छावाली उस शूर्पणखा से बोले—हे वाले ! मेरा तो विवाह हो चुका है तुम मेरे छोटे भाई के पास जाओ ॥ ३४ ॥

ज्येष्ठाभिगमनात्पूर्वं तेनाप्यनभिनन्दिताम् । साऽभूद्रामाश्रया भूयो नदीवोभयकूलभाक् ॥ ३५ ॥

अन्वयः—पूर्वं ज्येष्ठाभिगमनात् तेन अपि अनभिनन्दिता भूयः रामाश्रया सा उभयकूलभाक् नदी इव अभूत् ।

ज्येष्ठेति । ज्येष्ठाभिगमनात्तेन लक्ष्मणेनाप्यनभिनन्दिता नाङ्गीकृता भूयो रामाश्रया रामसमीपं पुनरागच्छन्ती सा राक्षसी उभे कुले भजतीत्युभयकूलभाक् नदीवाभूत् । सा हि यातायाताभ्यां पर्यायेण कूलद्वयगामिनी नदीसदृश्यभूदित्यर्थः ।

भाषार्थ—वह झट लक्ष्मण के पास पहुँची लक्ष्मण ने उससे कहा तू मेरे बड़े भाई के पास विवाह की इच्छा से जा चुकी है इसलिए तू मेरी माता के समान है, मैं तुमसे विवाह नहीं कर सकता । यह सुनकर वह फिर राम के पास पहुँची । उस समय उसकी दशा उस नदी के समान हो गई, जो बारी-बारी अपने दोनों तटों का स्पर्श करती हुई बह रही हो ॥ ३५ ॥

संरम्भं मैथिलीहासः क्षणसौम्यां निनाय ताम् । निवातस्तिमितं वेलां चन्द्रोदय इवोदधेः ॥ ३६ ॥

अन्वयः—मैथिलीहासः क्षणसौम्यां तां निवातस्तिमितं उदधेः वेलां चन्द्रोदय इव संरम्भं निनाय ।

संरम्भमिति । मैथिलीहासः क्षणं सौम्यां सौम्याकारां तां राक्षसीं । निवातेन स्तिमितां निश्चलामुदधेर्वेलामम्बुविकृतिम् । अम्बुपूरमित्यर्थः । ‘अब्ध्याम्बुविकृतौ वेला’ इत्यमरः । चन्द्रोदय इव संरम्भं संक्षोभं निनाय ।

भाषार्थ—जिस प्रकार वायु के अभाव में शान्त समुद्र के तरङ्ग को चन्द्रमा संक्षुब्ध कर देता है, उसी प्रकार सीताजी को हँसते हुए देखकर क्षणभर के लिए सुन्दर बनी हुई वह शूर्पणखा बिगड़कर खड़ी हो गई और बोली ॥ ३६ ॥

फलमस्योपहासस्य सद्यः प्राप्स्यसि पश्य माम् । मृग्याः परिभवो व्याघ्रचामित्यवेहि त्वया कृतम् ॥ ३७ ॥

अन्वयः—अस्य उपहासस्य फलं सद्यः पाप्स्यसि, मां पश्य, त्वया कृतं व्याघ्रचां मृग्याः परिभव ( इति ) अवेहि ।

फलमिति । श्लोकद्वयेनान्वयः । अस्योपहासस्य फलं सद्यः सम्प्रत्येक

२६ र० सम्पू०