भारतकोश
रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)

DevanagariHindipublished735 पृष्ठ

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त्यिक वर्णन के पश्चात् निषादराज की निवासभूमि शृंगवेरपुर के परिचय के अनन्तर धाई के रूप में मानसरोवर से निर्गत सरयू नदी का सुन्दर वर्णन किया है।

इसके बाद श्रीराम ने कहा—सीते ! पृथ्वी से उठती हुई जो सामने धूलि दिखाई दे रही है, इससे मालूम पड़ता है कि हनुमान् जी से मेरे आगमन का समाचार सुनकर भरत सेना के साथ मेरी आगवानी करने के लिए आ रहे हैं। जैसे युद्ध में खरदूषण, त्रिशिरा आदि को मारकर लौटे हुए मुझको लक्ष्मण ने संरक्षित तथा निर्दोष तुम्हें सौंप दिया था, उसी प्रकार भरत भी पिता की प्रतिज्ञा का पालन करने वाले मुझको संरक्षित तथा निर्दोष राज्यलक्ष्मी को सौंप देंगे ।

वैदेही ! यह देखो, वल्कलवस्त्रधारी भरत पैदल ही गुरु वशिष्ठ जी को आगे एवं सेना को पीछे रखकर वृद्ध मन्त्रियों के साथ स्वयं हाथ में अर्घ्यपात्र लेकर स्वागत करने के लिए मेरे पास आ रहे हैं । ये पिताजी से प्राप्त राज्यलक्ष्मी को तरुण होते हुए भी मेरी भक्ति से भोग के बिना चौदह वर्षों से दुष्कर आचरण कर रहे हैं। रामचन्द्र जी के ऐसा कहने के बाद ही उनकी इच्छा से चलने वाला वह पुष्पक विमान भरत के अनुगामियों द्वारा देखते-देखते आकाश मण्डल से सहसा भूमि पर उतर पड़ा । बाद श्रीराम ने सेवा में निपुण वानरराज सुग्रीव के हाथ का सहारा लेकर आगे-आगे चलते हुए विभीषण द्वारा प्रदर्शित सोपान मार्ग से उस पुष्पक विमान से जमीन पर उतरकर कुलाचार्य वसिष्ठजी को प्रणाम करने के बाद भरत के अर्घ्य को स्वीकार करते हुए आनन्दाश्रुओं के साथ उनका आलिङ्गन किया और कुशल प्रश्न आदि से उन मन्त्रियों को अनुगृहीत किया, जो उनके वियोग में दाढ़ी-मूंछ बढ़ाकर जटावान् बरगद वृक्ष के समान विकृत मुख हो गये थे ।

अनन्तर श्रीराम ने भरत को सुग्रीव एवं विभीषण का परिचय देते हुए कहा—ये मेरे आपत्ति के बान्धव वानर और भालुओं के राजा सुग्रीव हैं तथा ये मेरे शत्रुओं पर प्रथम प्रहार करने वाले विभीषण हैं । यह सुन भरत जी ने सुग्रीव एवं विभीषण का अभिवादन आदि से सत्कार करने के बाद नतमस्तक हुए लक्ष्मण जी का सस्नेह गाढ़ आलिङ्गन किया । बाद रामचन्द्र जी की आज्ञा से सुग्रीव आदि वानरों ने कामरूपी होने के कारण मनुष्यशरीर धारण कर बड़े-बड़े हाथियों पर सवार होकर पहाड़ों पर चढ़ने के सुख का अनुभव किया । अनुचरों के सहित विभीषण आदि श्रीराम के आदेश से उत्तम रथों पर आरूढ