रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)
Raghuvamsham of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४५४ रघुवंशमहाकाव्ये
जाय और वह उससे भोग न करके तलवार की धारा पर चलने के समान कठोर इन्द्रियों को वश में रखने का व्रत कर ले वैसे ही भरत ने भी पिता की दी हुई राज्यलक्ष्मी को भोग करने की शक्ति रहते हुए भी मेरी भक्ति के कारण उसका भोग न करके १४ वर्ष तक कठिन असिधारा व्रत का पालन किया है ॥ ६७ ॥
एतावदुक्तवति दाशरथौ तदीया- मिच्छां विमानमधिदेवतया विदित्वा । ज्योतिष्पथादवततार सविस्मयाभि- रुद्वीक्षितं प्रकृतिभिर्भरतानुगाभिः ॥ ६८ ॥
अन्वयः—दाशरथौ एतावदुक्तवति विमानं तदीयां इच्छाम् अधिदेवतया विदित्वा सविस्मयाभिः, भरतानुगाभिः प्रकृतिभिः उद्वीक्षितं सत् ज्योतिष्पथात् अवततार ।
एतावदिति । दाशरथौ राम एतावदुक्तवति सति विमानं पुष्पकं कर्तृ, तदीयां रामसंबन्धिनीमिच्छामधिदेवतया मिषेण विदित्वा तत्प्रेरितं सदित्यर्थः । सविस्मयाभिर्भरतानुगाभिः प्रकृतिभिः प्रजाभिरुद्वीक्षितं ऊर्ध्वदृष्टं सज्ज्योतिष्पथादाकाशादवततार ।
भावार्थ—जब राम इस प्रकार कह रहे थे उसी समय रामकी इच्छा को ही विमान का चालक मानकर वह विमान आकाश से नीचे उतर आया और भरतजी के पीछे चलनेवाली सारी जनता आश्चर्य-चकित होकर उन्हें देखने लगी ॥ ६८ ॥
तस्मात्पुरःसरविभीषणदर्शितेन सेवाविचक्षणहरीश्वरदत्तहस्तः । यानादवातरददूरमहीतलेन मार्गेण भङ्गिरचितस्फटिकेन रामः ॥ ६९ ॥
अन्वयः—रामः सेवाविचक्षणहरीश्वरदत्तहस्तः पुरःसरविभीषणदर्शितेन अदूरमहीतलेन भंगि रचितस्फटिकेन मार्गेण तस्मात् यानात् अवातरत् ।
तस्मादिति । रामः सेवायां विचक्षणः कुशलो हरीश्वरः सुग्रीवस्तेन दत्तो हस्तो हस्तावलम्बनो यस्य तादृशः सन् स्थलज्ञत्वात्पुरःसरो विभीषणस्तेन दर्शितेनादूरमासन्नं महीतलं यस्य तेन भङ्गिभिर्विच्छित्तिभी रचितस्फटिकेन बद्धस्फटिकेन सोपानपर्वणा मार्गेण तस्माद्यानात्पुष्पकादवातरदवतीर्णवान् । तरतेर्लङ् ।
भावार्थ—सेवा में चतुर सुग्रीव के हाथों का अवलम्बन करके स्फटिक मणियों से जड़ी हुई सीढ़ी से रामचन्द्रजी विमान से उतरे और विभीषण आगे-आगे मार्ग दिखाते चले ॥ ६९ ॥