भारतकोश
रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)

DevanagariHindipublished735 पृष्ठ

पृष्ठ 519, कुल 735 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 519
४६०रघुवंशमहाकाव्ये

**भाषार्थ—**आगे-आगे अयोध्या की जनता चल रही थी और पीछे-पीछे वह पुष्पक विमान चल रहा था जिस पर राम बैठे हुए थे। इस प्रकार आधाकोस चलकर राम ने अयोध्या के उस सुन्दर उपवन में निवास किया जिसे शत्रुघ्नजी ने पहले ही भली-भाँति सजा दिया था ॥ ७९ ॥

यह त्रिपाठ्युपाव्ह पं० श्रीकृष्णमणिशास्त्री द्वारा लिखित अन्वय
और चन्द्रकला नाम की हिन्दी टीका में रघुवंश
महाकाव्य का दण्डकवन से प्रत्यागमन नामक
त्रयोदश सर्ग समाप्त हुआ ॥ १३ ॥


चतुर्दशः सर्गः

संजीवनं मैथिलकन्यकायाः सौन्दर्यसर्वस्वमहानिधानम् ।
शशाङ्कपङ्केरुहयोः समानं रामस्य वन्दे रमणीयमास्यम् ॥

भर्तुः प्रणाशादथ शोचनीयं दशान्तरं तत्र समं प्रपन्ने ।
अपश्यतां दाशरथी जनन्यौ खेदादिवोपघ्नतरोर्व्रतत्यौ ॥ १ ॥

**अन्वयः—**अथ दाशरथी उपघ्नतरोः छेदात् व्रतत्यौ इव भर्तुः प्रणाशात् शोचनीयं दशान्तरं प्रपन्ने जनन्यौ तत्र समम् अपश्यताम् ।

भर्तुरिति । अथोपवनाधिष्ठानानन्तरं दाशरथी रामलक्ष्मणौ उपघ्नतरोराश्रयवृक्षस्य । ‘उपघ्न आश्रये’ इति निपातः । तस्य छेदाद् व्रतत्यौ लते इव । ‘वल्ली तु व्रततिर्लता’ इत्यमरः । भर्तुर्दशरथस्य प्रणाशाच्छोचनीयम् दशान्तरमवस्थान्तरम् । ‘अवस्थायां वस्त्रान्ते स्याद्दशापि’ इति विश्वः । प्रपन्ने प्राप्ते जनन्यौ कौसल्यासुमित्रे तत्र साकेतोपवने समं युगपदपश्यताम् । दृशेः कर्तरि लङ् ।

**भाषार्थ—**इसके बाद उस उपवन में राम और लक्ष्मणजी अपनी माताओं से मिले जो उसी प्रकार उदास लग रही थीं जिस प्रकार वृक्ष के कट जाने पर उसके सहारे चढ़ी हुई लतायें मुरझा जाती हैं ॥ १ ॥

उभाबुभाभ्यां प्रणतौ हतारी यथाक्रमं विक्रमशोभिनौ तौ ।
विस्पष्टमस्रान्धतया न दृष्टौ ज्ञातौ सुतस्पर्शसुखोपलम्भात् ॥ २ ॥

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या) · पृष्ठ 519, कुल 735 में से · BharatKosha