भारतकोश
रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)

DevanagariHindipublished735 पृष्ठ

पृष्ठ 524, कुल 735 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 524

चतुर्दशः सर्गः | ४६५


अन्वयः—श्वश्रूजनानुष्ठितचारुवेषां कर्णीरथस्थां रघुवीरपत्नीं साकेतनार्यः प्रासादवातायनदृश्यबन्धैः अञ्जलिभिः प्रणेमुः।

श्वश्रूजनेति। श्वश्रूजनैरनुष्ठितचारुवेषां कृतसौम्यनेपथ्याम्। 'आकल्पवेषौ नेपथ्यम्' इत्यमरः। कर्णीरथः स्त्रीयोग्योऽल्परथः। 'कर्णीरथः प्रवहणं डयनं रथगर्भके' इति यादवः। तत्रस्थां रघुवीरपत्नीं सीतां साकेतनार्यः प्रासादवातायनेषु दृश्यबन्धैर्लक्ष्यपुटैरञ्जलिभिः प्रणेमुः।

भाषार्थ—भवनों के झरोखों में दिखाई देनेवाली अयोध्या की महिलाओं ने हाथ जोड़कर उन सीताजी को प्रणाम किया जो उस समय पालकी में बैठी हुई थी और जिन्हें कौशल्या सुमित्रा ने सुन्दर ढंग से वस्त्र और आभूषणों से सुसज्जित कर दिया था॥ १३॥


स्फुरत्प्रभामण्डलमानुसूयं सा बिभ्रती शाश्वतमङ्गरागम्।
रराज शुद्धेति पुनः स्वपुर्यै संदर्शिता वह्निगतेव भर्त्रा॥ १४॥

अन्वयः—स्फुरत्प्रभामण्डलम् आनुसूयं शाश्वतम् अङ्गरागं बिभ्रती सा भर्त्रा स्वपुर्यै शुद्धा इति संदर्शिता पुनः वह्निगता इव रराज।

स्फुरदिति। स्फुरत्प्रभामण्डलमानुसूयमनुसूयया दत्तं शाश्वतं सदातनमङ्गरागं विलेपनद्रव्यं बिभ्रती सा सीता भर्त्रा स्वपुर्यै शुद्धेति सन्दर्शिता पुनर्वह्निगतेव रराज।

भाषार्थ—सीताजी के शरीर पर अब भी वह अमिट कान्तिवाला अङ्गराग लगा हुआ था जो अनुसूया जी ने उनके शरीर में लगा दिया था, उससे अग्नि के समान प्रकाशमान उनका शरीर ऐसा दिखाई दे रहा था मानो अयोध्या वासियों को सीताजी की शुद्धता दिखाने के लिए राम ने उन्हें अग्नि में पुनः प्रवेश कराकर शुद्ध कर दिया था॥ १४॥


वेश्मानि रामः परिबर्हवन्ति विश्राण्य सौहार्दनिधिः सुहृद्भ्यः।
बाष्पायमाणो बलिमन्निकेतमालेख्यशेषस्य पितुर्विवेश॥ १५॥

अन्वयः—सौहार्दनिधिः रामः सुहृद्भ्यः परिबर्हवन्ति वेश्मानि विश्राण्य आलेख्यशेषस्य पितुः बलिमत् निकेतं बाष्पायमाणः (सन्) विवेश।

वेश्मानीति। सुहृदो भावः सौहार्दं सौजन्यम्। "हृद्भगसिन्ध्वन्ते पूर्वपदस्य च" इत्युभयपदवृद्धिः। सौहार्दनिधी रामः सुहृद्भ्यः सुग्रीवादिभ्यः परिबर्हवन्त्युपकरणवन्ति वेश्मानि विश्राण्य दत्त्वा आलेख्यशेषस्य चित्रमात्रशेषस्य पितुर्वलिमत्पूजायुक्तं निकेतनं गृहं बाष्पमुद्वमन्विवेश। 'बाष्पोष्मभ्यामुद्वमने" इति क्यङ् प्रत्ययः।