भारतकोश
रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)

DevanagariHindipublished735 पृष्ठ

पृष्ठ 671, कुल 735 में से

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३१२ रघुवंशमहाकाव्ये

निर्वृत्तेति। निर्वृत्ता जाम्बूनदपट्टशोभा यस्य तस्मिन्कृतकनकपट्टशोभे ललाटे न्यस्तं तिलकं दधानः स्मेरमुखः स्मितमुखः स राजारिसुन्दरीणां मुखानि तेनैव तिलकेनैव शून्यानि चकार। अखिलमपि शत्रुवर्गमवधीदिति भावः।

भाषार्थ— सुवर्ण का पट्टा बँधे हुए अपने ललाट पर वे स्वयं तिलक लगाते थे और सदा हँसमुख रहते थे पर संग्राम में शत्रुओं को नष्ट करके उन्होंने शत्रुओं की स्त्रियों के मुख का तिलक और उनकी मुसकराहट छीन ली ॥ ४४ ॥

शिरीषपुष्पाधिकसौकुमार्यः खेदं स यायादपि भूषणेन।
नितान्तगुर्वीमपि सोऽनुभावाद्धुरं धरित्र्या बिभराम्बभूव ॥ ४५ ॥

अन्वयः— शिरीषपुष्पाधिकसौकुमार्यः ( अतएव ) स भूषणेन अपि खेदं यायात् स नितान्तगुर्वी अपि धरित्र्या धुरं अनुभावात् बिभरांबभूव।

शिरीषेति। शिरीषपुष्पाधिकसौकुमार्यः। कोमलाङ्ग इत्यर्थः, अत एव स राजा भूषणेनापि खेदं श्रमं यायाद् गच्छेत्। एवंभूतः स नितान्तगुर्वीमपि धरित्र्या धुरं भुवो भारमनुभावात्सामर्थ्याद् बिभराम्बभूव बभार। 'भीह्रीभृहुवां श्लुवच्च' इति विकल्पादाम्प्रत्ययः।

भाषार्थ— वे सिरस के फूल से भी अधिक सुकुमार थे इसलिए उन्हें गहने-पहनने में भी कष्ट होता था फिर भी उनमें आत्मशक्ति इतनी थी कि उन्होंने पृथ्वी के अत्यन्त भारी भार को संभाल लिया ॥ ४५ ॥

न्यस्ताक्षरामक्षरभूमिकायां कात्स्न्येन गृह्णाति लिपिं न यावत्।
सर्वाणि तावच्छ्रुतवृद्धयोगात्फलान्युपायुङ्क्त स दण्डनीतेः ॥ ४६ ॥

अन्वयः— अक्षरभूमिकायां न्यस्ताक्षरां लिपिं कात्स्न्येन यावत् न गृह्णाति स तावत् श्रुतवृद्धयोगात् सर्वाणि दण्डनीतेः फलानि उपायुङ्क्त।

न्यस्तेति। अक्षरभूमिकायामक्षरलेखनस्थले न्यस्ताक्षरां रचिताक्षरपंक्तिरेखान्यासां लिपिं पञ्चाशद्वर्णात्मिकां मातृकां कात्स्न्येन यावन्न गृह्णाति स सुदर्शनस्तावच्छ्रुतवृद्धयोगाद्विद्यावृद्धसंसर्गात्सर्वाणि दण्डनीतेर्दण्डशास्त्रस्य फलान्युपायुंक्तान्वभूत्। प्रागेव बद्धफलस्य तस्य पश्चादभ्यस्यमानं शास्त्रं संवादार्थमिवाभवदित्यर्थः।

भाषार्थ— अभी वे पटिया पर अच्छी तरह अक्षर भी लिखना नहीं सीख पाये थे कि विद्वानों के संसर्ग से वे दण्डनीति और राजनीति की सारी बातें जान गये ॥ ४६ ॥

उरस्यपर्याप्तनिवेशभागा प्रौढीमविष्यन्तमुदीक्षमाणा।
सञ्जातलज्जेव तमातपत्रच्छायाछलेनोपजुगूह लक्ष्मीः ॥ ४७ ॥

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