भारतकोश
रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)

DevanagariHindipublished735 पृष्ठ

पृष्ठ 675, कुल 735 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 675

३१६ रघुवंशमहाकाव्ये

ते अधिविविदुरधिविन्ने चक्रुः । आत्मना सपत्नीभावं चक्रुरित्यर्थः । 'कृत- सापत्निकाढ्यूढाधिविन्ना' इत्यमरः ।

इति महामहोपाध्यायकोलाचलमल्लिनाथसूरिविरचितया संजीवनीसमाख्यया व्याख्यया समेतो महाकविश्रीकालिदासकृतौ रघुवंशे महाकाव्ये वंशानुक्रमो नामाष्टादशः सर्गः ॥ १८ ॥

भाषार्थ—दूतियाँ भिन्न-भिन्न राजधानियों में जाकर सुन्दर-सुन्दर राज- कुमारियों का चित्र ले आईं और राजा को शुद्ध सन्तान होने की इच्छा से मन्त्रियों ने चित्र से भी बढ़कर सुन्दरी उन राजकुमारियों का राजा सुदर्शन से विवाह कर दिया । विवाह हो जाने पर वे सब राजकुमारियाँ राजा की पहली रानियों की पृथ्वी और राजलक्ष्मी की सौत के समान हो गईं ॥ ५३ ॥


एकोनविंशः सर्गः

मनसो मम संसारबन्धनमुच्छेत्तुमिच्छतः ।
रामचन्द्रपदाम्भोजयुगल निविडायताम् ॥

अग्निवर्णमभिषिच्य राघवः स्वे पदे तनयमग्नितेजसम् ।
शिश्रिये श्रुतवतामपश्चिमः पश्चिमे वयसि नैमिषं वशी ॥ १ ॥

अन्वयः—श्रुतवतां अपश्चिमः वशी राघवः पश्चिमे वयसि स्वे पदे अग्नितेजसं तनयं अभिषिच्य नैमिषं शिश्रिये ।

अग्निवर्णमिति । श्रुतवतां श्रुतसम्पन्नानामपश्चिमः प्रथमो वशी जितेन्द्रियो राघवः सुदर्शनः पश्चिमे वयसि वार्द्धके स्वे पदे स्थानेऽग्नितेजसं तनयमग्निवर्णमभिषिच्य नैमिषं नैमिषारण्यं शिश्रिये श्रितवान् ।

भाषार्थ—विद्वानों में प्रधान रघुकुलोत्पन्न एवं जितेन्द्रिय राजा सुदर्शन वृद्धावस्था में अग्नि के समान तेजस्वी अपने पुत्र अग्निवर्ण को अपने स्थान पर राजा बनाकर स्वयं नैमिषारण्य में चले गये ॥ १ ॥

तत्र तीर्थसलिलैन दीर्घिकास्तल्पमन्तरितभूमिभिः कुशैः ।
सौधवासमुटजेन विस्मृतः संचिकाय फलनिःस्पृहस्तपः ॥ २॥