भारतकोश
रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)

DevanagariHindipublished735 पृष्ठ

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प्राक्कथन

स विश्ववन्द्यो महतां कवीनां गुरुर्मनीषी कविकालिदासः ।
यत्काव्यपीयूषरसप्रवाहः स्वादात्मितानन्दमयो हि लोकः ॥

कविकुलकलाधर कविवर कालिदास की कमनीयकलेवर कविता विश्व के किस सहृदय-हृदय को आनन्दमग्न नहीं कर देती ? महाकवि कालिदास हमारे राष्ट्रीय कवि तथा भारतीय संस्कृति के प्रमुख परिपोषक थे। भारत की संस्कृति इनकी काव्यवाणी में बोलती है और इनके नाटकों में अपना मनोरम रूप दिखाकर मानवमात्र के हृदय का मनोरञ्जन करती है। कालिदास ने अपने काव्य-चमत्कार से समस्त संसार में ख्याति प्राप्त की है। इनके काव्यों में पदलालित्य, रचनाचातुर्य, कल्पनाशक्ति, प्रकृतिवर्णन एवं चरित्र-चित्रण पढ़कर विश्व का प्रत्येक पाठक प्रफुल्ल हो उठता है। इनमें विचारगाम्भीर्य है, संसार का अनुभव है, बहुमूल्य सिद्धान्त हैं, इनके पदों से उपदेश भी मिलता है और इनकी उक्तियाँ आज भी हमारा पथ-प्रदर्शन करती हैं। इनकी कविता में प्रसादगुण की अगाधता, माधुर्य का मधुर सन्निवेश, कोमलकान्तपदावली का प्राचुर्य, उपमा की अपूर्वता, अलङ्कारों की रमणीयता, छन्दों की छटा और भावसौष्ठव पर्याप्तमात्रा में विद्यमान हैं। इनके काव्यों को जिस दृष्टि से देखा जाय उसी से काव्यकला की कमनीयता प्रकट होती है। इनकी कविता में सरस, सरल, सुबोध तथा सुन्दर शब्द एवं भावों का साम्राज्य, सहृदयों की तो बात ही क्या है, साधारण मनुष्य के मन को भी मुग्ध कर देता है। व्यंग्यार्थप्रतिपादन की विलक्षण शैली, रसप्रकर्ष का प्रकाशन, विस्तृत विषय का थोड़े में वर्णन, वर्ण्य-विषय को सुन्दर क्रम से रखकर रोचक बनाना, स्वाभाविक भाव के द्वारा लोकोत्तरानन्दप्रदान का ढंग आदि कालिदास की कविता के विशेष गुण हैं।

कालिदास संस्कृत साहित्य के अद्वितीय महाकवि माने जाते हैं। इनकी कविता की मधुरिमा के सामने अन्य कवियों की कविता फीकी पड़ जाती है। आपने जैसा मानवहृदय के सूक्ष्म से सूक्ष्म भावों का निरीक्षण किया है वैसा अन्य कवियों ने नहीं। कालिदास अन्तर तथा बाह्य दोनों जगत् के सूक्ष्म निरीक्षक कवि हैं।

यों तो कालिदास ने अपनी रचनाओं में स्थान-स्थान पर सभी रसों का सन्निवेश किया है, पर ये प्रधान रूप से शृङ्गार रस के रसिक कवि हैं। इनकी रचनाएँ शृङ्गार रस से ओत-प्रोत हैं। इनके काव्यों में सम्भोग-शृङ्गार का प्रकाशमान रूप तथा विप्रलम्भ-शृङ्गार की करुणामूर्ति पाठक एवं श्रोताओं के हृदय को चमत्कृत कर देते हैं। मेघदूत में विप्रलम्भ-शृङ्गार और कुमारसम्भव में सम्भोग-शृङ्गार का प्राचुर्य है। सम्भोग-शृङ्गार की अपेक्षा इनका विप्रलम्भ-शृङ्गार उच्चकोटि का होता है। मेघदूत का उदाहरण देखिए—

त्वामालिख्य प्रणयकुपितां धातुरागैः शिलाया-
मात्मानं ते चरणपतितं यावदिच्छामि कर्तुम् ।