राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८ राजतरङ्गिणी १
है कि पर्वतीय चट्टानें ८ सो फीट ऊँचाई से कम नहीं हैं । तन्तमूल के समीप झेलम समुद्र की सतह से ५ हजार फीट ऊंचाई पर है । समस्त काश्मीर उपत्यका जलमय रही होगी । जब तक वह चट्टान घिसकर पतली नहीं हो गई होगी । काश्मीर की झील का जल स्तर समुद्र की सतह से ५८०० फीट ऊँचा है । उपत्यका में इस समय तक के बचे करेवा और बिखरी एलूवियल (कछारी) समतल भूमि से ५० या १०० फीट ऊंचाई पर जल रहा होगा । भारतण्ड की ऊँची भूमि जल के नीचे नहीं रही होगी । वामजू की गुफा के चूने के पत्थरो के चट्टान के ऊपर समयर तटवर्ती पानी की सतह का चिह्न स्पष्ट दिखाई देता है । इसी प्रकार वामन के पवित्र जलस्रोत के ऊपर इस प्रकार के चिह्न दिखाई देते हैं । शुपियान नदी पर स्थित रामू के सराय के ऊपर करेवा एक किनारा बनाता है । उसको ऊंचाई १०० फीट है । उसके क्षैतिज परतो में विभिन्नता है । सबसे ऊँचाई पर २० फीट की जमीन एलूवियल है । उसके पश्चात् २० फिट का परत गोले-गोले पत्थरो और भुरभुरी मिट्टी का बना है । सबसे नीचे का परत कड़ी नीली मिट्टी का है । यह परत निश्चय ही झील के जल की निश्चल स्थिति के कारण बन गया होगा । किन्तु मध्यवर्ती मिट्टी की परत उस समय बनी होगी जब उपत्यका का जड़ बड़े वेग के साथ तन्तमूल के नीचे वाली चट्टान के अवरोध के हट जाने के कारण निकला होगा । यह जणावरोध चट्टान के अकस्मात् टूट जाने के कारण हुआ होगा । सबसे ऊपर की मिट्टी उस समय जमी होगी जबकि पानी घटता-घटता अपनी वर्तमान स्थिति पर आ गया होगा । तत्पश्चात् चट्टान का अवरोध अथवा पानी रोकने वाली पथरीली नदी का नदीगर्त क्रमशः जल प्रवाह के कारण घिसता-घिसता क्षीण हो गया होगा तो विभिन्न नदियों ने झील के पुराने गर्त में नवीन धाराओं में अपने को परिणत कर लिया होगा । जब तक कि मोनार, पामपुर तथा खानपुर के करवा घटते पानी के कारण द्वीप तुल्य लगते होंगे । और कालान्तर में लम्बे चोपटे शिखरीय पहाड़ियों के रूप में खुले मैदान में रह गये जैसे आज दिखाई पड़ते है ।' (लद्दार) डब्लू वेकफील्ड लिखते हैं : कोई प्रामाणिक प्रमाण इस बात का नहीं मिलता कि काश्मीर उपत्यका झील से अकस्मात् अपनी वर्तमान दशा में किस समय परिवर्तित हो गयी है जैसा कि आज दिखाई देती है । न तो हमे यह प्रमाण मिलता है कि यह झील कब सूख गयी । अथवा यह प्रक्रिया बारहमूला दर्रा के समीप हठात् एक मार्ग बन जाने के कारण हो गया अथवा इसका पानी कालान्तर में निकलता गया ।' (हैप्पी वैली ६९, ६०) वाइन के इस सिद्धान्त पर कि वह कभी समुद्री जल की झील थी और समुद्र का पानी निकल जाने पर प्राकृतिक मीठे पानी के झरनों के कारण नमकीन जल समाप्त होकर काश्मीर उपत्यका ने वर्तमान रूप प्राप्त किया है, वेकफील्ड लिखता है- इसका कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिलता कि उपत्यका का जल हठात् बाहर निकल गया और उसने वह रूप प्राप्त कर लिया है जिसे हम आज देखते हैं । बातो की जाँच करने और जैसा कि एक योग्य भूगर्भ-शास्त्रीय करता है । बात उल्टी साबित होती है । वाइन ने उन्हें स्वय सम्मुख रखा है । वह योग्य तथा निपुण पर्यवेक्षक था । वह यहाँ के निवासियो की परम्परा में विश्वास करता है कि उपत्यका अपने मूल रूप में ३०० या ४०० फीट गहरी झील थी । किन्तु वह कहता है कि समय प्रभाव के कारण पानी बहकर बाहर निकल गया । अपने पर्यवेक्षण में वह इस नतीजे पर आगया है कि यहाँ गहरी हरी अथवा बादामी चट्टानो की पहाड़ियों को जो काश्मीर के चारो तरफ है वे विशाल