राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग ४१
मे छपी। उसमें उन्होंने एक नवीन सिद्धान्त का मत को यहाँ पर संक्षेप में उद्धृत कर देना मैं उचित प्रतिपादन किया है। कुछ समय पश्चात् वे पुन. समझता हूँ। आये। इस प्रयोग मे उन्होंने स्वीकार किया कि 'यह कहा जाता है कि काश्मीर की भूमि एक श्री ए. सी. दास के 'ऋग्वेदिक इण्डिया' पुस्तक से झील थी। वह १६००० वर्ग मील क्षेत्र में फैली वे प्रभावित हुए हैं। उनका सिद्धान्त उक्त पुस्तक थी। यह २००० फीट गहरी थी। चारों ओर से मिलता है। पर्वतो से घिरी थी। तिब्बत उत्तर मे, कैलास पूर्व उनके काश्मीर विषयक सिद्धान्त को मैं यहाँ संक्षेप मे, और सप्तसिन्धु का भूमि खण्ड दक्षिण तथा में उद्धृत कर देना उचित समझता हूँ। उनके दक्षिण पश्चिम में था। हमने देखा है कि जिन्दा- सिद्धान्त को स्वीकार करने के पूर्व काश्मीर के भूग- वेस्ता में इस चतुष्कोणीय भूमि का नाम 'वरण' अर्थात् र्भीय ज्ञान का विशेष अध्ययन आवश्यक है। 'वरुण' का देश कहा गया है। उसका उल्लेख 'हफ्त काश्मीर मे गुहा निवासियो के स्थानो पर खनन हिग्द' अर्थात् 'सप्त सिन्ध' के पूर्व किया गया है। कार्य केन्द्रीय सरकार द्वारा हुआ है। उनसे काश्मीर 'नागा जाति' चीनी तुर्किस्तान तथा उसके आस पास उपत्यका के भूगर्भीय रचना पर प्रकाश पडता है। रहती थी। उनके देश के साथ 'गरुड़' का देश मिला मैंने इन गुफाओं तथा उनमे प्राप्त सामग्रियों को था। दोनो जातियों मे सघर्ष होता रहता था। अत- सन् १९६२ तथा सन् १९६६ में काश्मीर जाकर एव नागा जाति ने काश्मीर में गरुड जाति के भय देखा तथा अध्ययन किया है। के कारण शरण लिया।
भूगर्भीय स्तर के अध्ययन से इतना अवश्य स्पष्ट 'कहा जाता है कि काश्मीर में एक भेद पर्वत
हो जाता है कि काश्मीर उपत्यका जल से कभी पूर्ण था। उस पर देवी सरस्वती अपने वाहन मोर पर थी। पानी कभी निकल गया। सूखी भूमि हो गयी। रहती थी। यह पर्वत भी तोडा गया और सरस्वती डा० सिंघल द्वारा प्रतिपादित अन्य सिद्धान्तों को, तथा पार्वती ने सरिताओं का रूप धारण कर लिया। जब तक कुछ और अनुसन्धान न हो जाय और प्रमाण न मिल जाय, स्वीकार करने मे कठिनता होगी। 'ऋग्वेद' इस कथानक को अर्थयुक्त रूप से वेद की जिन ऋचाओं का उल्लेख डा० सिंघल ने उपस्थित करता है। 'इन्द्र' का प्रथम कार्य यह था किया है ओर जो अर्थ उन्होंने लगाने का प्रयास किया कि उसने अहिदस्यु 'वृत्र' तथा उसकी माता संहार है वे अत्यन्त विवादास्पद हैं। किया। जिन्होंने मेघ से गिरते जल को नागाओ द्वारा रचित गुहा में बन्द कर रखा था। इन्द्र ने भेद का 'त्रित' के सम्बन्ध में मैंने अपनी पुस्तक 'वैदिक भी निर्धन कर वध कर दिया। दस्युओं का जो वहाँ कथा' ( २७-३३) में विस्तृत प्रकाश डाला है। पर रहते थे उनका संहार किया। उसने वज्र प्रहार मैं डा० सिंघल की विवृति का समर्थन करने में अस- द्वारा पर्वत तोड डाला। वह जल बह कर 'सप्तसिन्ध' मर्थ हूँ। यहाँ स्थानाभाव से विशेष विवृति करना की सात नदियाँ हुई। और समुद्र में जाकर मिल गयी। अप्रासंगिक होगा। 'भेद' का अर्थ जो डा० सिंघल ने 'त्रित' को वाराह भी कहते हैं। अर्थात् बारह- लगाया है वह काश्मीरी परम्परा तथा इतिहास से मूला के समीप वह मारा गया था। सरस्वती उनमे मेल नही खाता। 'गंगोद्भेद' तीर्थ तथा 'भेदादेवी' से मुख्य नदी थी। जो मुक्त की गयी थी। दस्यु लोग 'भेद पर्वत' के प्रसंग मे श्लोक संख्या ३४ की टिप्पणी 'अनासो' अर्थात् नासिका रहित थे। अर्थात् वे चिपटी तथा परिशिष्ट द्रष्टव्य है। तथापि डा० सिंघल के नाक वाले थे। ऋग्वेद में यह भी वर्णन आता है कि