राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरङ्ग ४९
[बायाँ स्तम्भ] कश्यपेश्वरः हिमाचलेशं शंखेशं देशं चैवसिलेश्वरम् । महानन्दीश्वरं शम्भुं वरदं कश्यपेश्वरम् ॥ —1025।१९९७ शम्भुंस्तथा चन्द्रदिवाकरौ द्वौ जग्राह देवोऽथ करद्वयेन। प्रकाशमासीज्जगतो निमेषाद्ध्वस्तं तथा सर्वमथान्धकारम् ॥ 171।२२३-२२४ ध्वस्तेऽन्धकारे हरिरप्रमेयः योगेन कृत्वा स्वपरं शरीरम् दैत्येन युद्धं स चकार सार्धं देहेन चान्येन स युद्धमैक्षत् ॥—172।२२४ विष्णोश्च दैत्येन बभूव युद्धं घोरं द्रुमैः पर्वतमस्तकैश्च युद्धं च ते देवगणाः समस्ताः प्रहृष्टचित्ता ददृशुः समन्तात् ॥ 173।२२५-२२६ जल निकल जाने के कारण सतीसर सुंदर आनंद कानन में परिणत हो गया । अबुल फजल आइने अकबरी में लिखता है—'जब जल घट गया, तो कश्यप जो अपनी तपस्या के लिए प्रसिद्ध थे, ब्राह्मणो को इस देश मे आबाद करने के लिए लाये । आद- मियो की तादाद बहुत बढ गयी, तो शासन करना आवश्यक हो गया । 'सभा में एक मत से लोगो ने जो उनमें गुणी था, राजा चुन लिया । उस समय से काश्मीर में राजतंत्र स्थापित हो गया । राजा गोनन्द के समय तक चलता रहा । उसे आज अर्थात् १४ वर्ष अकबर के शासन काल से ४४४४ वर्ष हो चुके हैं ।' कश्यपपुर ( मुलतान ) मुलतान का प्राचीन नाम था । तत्पश्चात् हंसपुर, वेगपुर, शांबपुर तथा अंत में इसका नाम मूलस्थान हुआ । वर्तमान मुलतान शब्द मूलस्थान का अपभ्रंश है । लगभग ३००० वर्ष ईसा पूर्व मुलतान का निश्चित नाम क्या था, कहना कठिन है महेनजोदारो तथा हरप्पा से इस नगर का संबंध जल और स्थल दोनों मार्गों से था । यह निर्विवाद है । मुलतान का नाम ई० पू० ६०० वर्ष मे प्रकाश में आया है । ७
[दायाँ स्तम्भ] ऊपर लिख चुका हूँ, मुलतान का प्राचीन भार- तीय नाम कश्यपपुर था । फारसी तथा प्राकृत भाषा में मुलतान को कश्यपपुर नाम से संबोधित किया गया है । हेकालोरस ने इसका यूनानी नाम 'कश- पापैरोम' दिया है । यह यूनानी शब्द निसंदेह कश्य- पुर का अपभ्रंश है । प्रसिद्ध यूनानी इतिहासकार हिरोडोटस ने 'कश- पतेरोस' नाम का उल्लेख किया है । अलकझेंद्र अर्थात् सिकंदर के ऐतिहासिको ने मुलतान को 'मोल्लियों' की राजधानी बताया है । प्तोलेमी ने 'कसपुर' नाम दिया है । यह शब्द कश्यपपुर का अपभ्रंश है । सन् ६४१ ई० में व्हेनसांग भारत आया था । पर्यटन काल में इस स्थान की यात्रा की थी । मुल- तान के विशाल सूर्य मंदिर तथा नगर का अद्भुत वर्णन करता है । आठवी शताब्दी के पश्चात् मूलस्थान का अप- भ्रंश मुलतान हो गया । एक प्राचीन गाथा है । भगवान् नरसिंह ने यहाँ अवतार लिया था । नरसिंह भगवान् ने हिरण्यकश्यप राक्षस का वध किया था । हिरण्यकश्यप राक्षसो का राजा था । हिरण्य शब्द के साथ कश्यप शब्द इस बात का बोध कराता है कि हिरण्यकश्यप का संबंध कश्यप वंश तथा कश्यप- पुर से था । कश्यप राक्षसों के आद्य पुरुष थे । हिरण्य- कश्यप का पुत्र विष्णु का उपासक था । राक्षस, पिशाच तथा नाग जाति शिव की उपासक थी । हिरण्यकश्यप संभवतः विष्णु पूजा का विरोधी था । उसका यह विरोध विष्णु भक्ति की ओर आकर्षित प्रह्लाद के प्रति उग्र हो उठा । अनुमान किया जा सकता है । नरसिंहावतार की कथा शैव तथा वैष्णव मत के संघर्ष का एक रूपक है । कश्यपपुर का नाम मूलस्थान किस प्रकार पड़ गया । विचारणीय विषय है । मैं समझता हूँ, । जहाँ भगवान् के अवतार लेने के स्थान का संकेत