राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
DevanagariHindipublished984 पृष्ठ
पृष्ठ 13, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 13
- घ - समान यदि अनुवाद सुन्दर है तो सच्चा नहीं हो सकता और सच्चा है तो सुन्दर नहीं हो सकता । उसने उत्तम अनुवाद को मौलिक रचना के समान माना है। यह मौलिकता फिट्जेराल्ड के रुबाइयात उमर खय्याम में परिलक्षित होती है। इसी प्रकार स्वर्गीय रामचन्द्र शुक्ल द्वारा अनूदित राखाल दास वन्द्यो- पाध्याय के 'कंकणा' में मौलिकता का दर्शन होता है। श्री रामचन्द्र वर्मा का अनुवाद हिन्दू राजतन्त्र' श्री जायसवाल की प्रसिद्ध पुस्तक 'हिन्दू पोलिटी' का अनुवाद है । श्री जायसवाल ने स्वयं स्वीकार किया था कि अनुवाद उनकी मूल पुस्तक से भी उत्तम है। क्रोचे कहता है कि अनुवाद मूल का पुनः सर्जन नहीं है; किन्तु मूल की अभिव्यक्ति के सदृश अभिव्यक्ति का सृजन हो सकता है। विश्व में सबसे अधिक अनूदित पुस्तक बाइबिल है। उसका अनुवाद दूसरी शताब्दी ईसवी से अब तक विश्व की अनेक भाषाओं में होता चला जा रहा है। बाइबिल की शैली धार्मिक ग्रन्थों में अपनायी जा सकती है। परन्तु राजतरंगिणी महा- काव्य है, ऐतिहासिक ग्रन्थ है। इसके अनुवाद की शैली काव्यमय एवं ऐतिहासिक होनी चाहिये । स्वर्गीय सर्वश्री योगेशचन्द्र दत्त, स्तीन तथा रणजीत सीताराम पण्डित का अंग्रेजी अनुवाद उपलब्ध है । श्री योगेश दत्त का अनुवाद सारानुवाद है। सर्वश्री स्तीन तथा पण्डित ने प्रत्येक श्लोक का अलग- अलग अनुवाद किया है। कहीं-कहीं अनुवाद को स्पष्ट करने के लिये तीन-चार श्लोकों का अनुवाद एक साथ कर दिया है। श्री स्तीन का अनुवाद शब्दानुवाद तथा अर्थानुवाद के साथ बोधगम्य है। श्री पण्डित का अनुवाद साहित्यिक है। उसमें भाषा का प्रवाह है। कल्हण के अलंकारों, उपमा एवं रसों को अंग्रेजी भाषा में व्यक्त करने का प्रयास किया गया है । प्रस्तुत अनुवाद शैली में प्रत्येक पद जिसमें क्रिया मिल गयी है उसका अनुवाद एक ही पद में किया गया है। यदि क्रिया दूसरे पद में मिली है तो पद तोड़कर अनुवाद किया गया है। जहाँ कल्हण ने युग्मम्, तिलकम् एवं कुलकम् लिखा है वहाँ दो, तीन तथा चार श्लोकों का भाव, अर्थ एवं अनुवाद एक साथ रखने का प्रयास किया गया है। उसमें भी प्रायः प्रत्येक श्लोक का अनुवाद अलग ही रखने का प्रयास किया गया है। श्लोक संख्या ६३ तक भावानुवाद, शब्दानुवाद तथा अर्थानुवाद का मिश्रण मिलेगा। उसके पश्चात् अनुवाद की शैली बदल दी गयी है। शब्दों के क्रिया, वचन एवं लिंग का मूल रूप ही अनुवाद में रखा गया है। प्रत्येक शब्द का अर्थ भाव के साथ किया गया है। अनेक संस्कृत शब्द जिनका हिन्दी में अनुवाद सम्भव नहीं था उन्हें यथावत रखकर उसका अर्थ पाद-टिप्पणी में स्पष्ट किया गया है । भारतीय भाषाओं की जननी संस्कृत है। कितने ही संस्कृत शब्द अप्रचलित हो गये हैं। कितनों का अर्थ आज वह नहीं है जो पूर्व काल में था। कितने ही अप्रचलित शब्दों का प्रयोग कल्हण ने किया है। शब्दों का अर्थ जो कल्हण के रचना काल में था उन्हें रखने का प्रयास किया है। किसी भी मौलिक ग्रन्थ के अनुवाद के लिये लेखक के वातावरण, निवास स्थान, समाज, तत्कालीन भूपरिचय, इतिहास, कुल, विचार तथा कथा-प्रसंग का ज्ञान होना आवश्यक है। इनका अध्ययन करने पर ही लेखक के मूल भाव की झलक मिल सकती है, उसकी आत्मा का दर्शन हो सकता है। कल्हण के निवास स्थान एवं जिन स्थानों का उसने वर्णन किया है उन्हें हमने स्वयं देखा है। वहाँ का अध्ययन किया है। अतएव अनुवाद करते समय सरलता का बोध हुआ है । जिन स्थलों पर सर्वश्री स्तीन तथा पण्डित के अनुवादों से अनुवाद भिन्न किया है अथवा शब्दों का अर्थ भिन्न किया है, उसका उल्लेख पाद टिप्पणी में कर दिया है। इस प्रकार यह अनुवाद अर्थानुवाद, भावा- नुवाद तथा शब्दानुवाद के साथ वाक्यार्थ प्रधान हो गया है। अनुवाद की रोचकता बढ़ाने के लिये अपनी