भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 146

प्रथम तरंग ६७ अलवेरूनी कुंड के विषय में अपनी पुस्तक दृष्ट्वा धनेश्वरं देवं वितस्ताहासमीपतः । ( भाग २ पृष्ठ १८१ ) में एक गाथा का उल्लेख कपटेश्वरपार्श्वे च दृष्ट्वाऽगस्त्येन निर्मितम् ॥ करता है। कश्मीरियों से सुनकर लिखा था। उसने —100 : १७७८ स्वयं इस स्थान की यात्रा नहीं की थी। अन्यथा वह अपनी नैसर्गिक प्रतिभा से यहाँ के प्राकृतिक तोयमप्यगतं दृष्ट्वा संप्राप्तं कपटेश्वरम् । दृश्य का इतना सुन्दर वर्णन करता कि वह स्वयं गोसहस्रमवाप्नोति संपूज्याभीप्सतां गतिम् ॥ एक ऐतिहासिक काव्य हो जाता। वह कहता है— 920—१०२९:१२०२ 'महादेव द्वारा प्रेषित लकडी के टुकडे प्रतिवर्ष कुंड में उतराते हैं। इस कुंड का नाम कुंडैशह किंवा कपटेश्वर इत्युक्तं देवदेवस्य शूलिनः । कवडेइवर है। यह वितस्ता नदी के उद्गम स्थल के पुण्यमायतनं तस्य समुत्पत्तिं वदस्व मे ॥ वाम दिशा में स्थित है। यह आश्चर्यजनक घटना —1125 : १३२९ वैशाख मास के मध्य काल में होती है।' रुद्रलोकमवाप्नोति स्नात्वा तु कपटेश्वरे । हरचरितामृत (अध्याय १४:१२२) में इस विश्वलिंगह्रदे स्नात्वा रुद्रलोके महीयते ॥ स्थान का उल्लेख मिलता है। यहाँ का वर्णन तथा —1302 : १५१६ तीर्थ यात्रा का जो समय अलवेरुनी ने दिया है वह माहात्म्य में दिये गये समय तथा वर्णन से मिलता नीलमत पुराण में कपटेश्वर माहात्म्य के है। अलवेरुनी ने जिन सूत्रों के आधार पर यहाँ का विषय में निम्नलिखित वर्णन मिलता है। वर्णन लिखा है वह सत्य प्रतीत होता है। गौरपाराशर उवाच : अबुल फजल आइने अकबरी में कपटेश्वर के वरश्च दीयते देव मम कामांगनाशन । विषय में लिखता है-'अलवेरनी का कवडेइवर शब्द ऋषिभिस्त्वं यथा दृष्टः काष्ठरूपी महेश्वरः ॥ कपटेश्वर का अपभ्रंश है। कोटेहर ग्राम में एक —1143 : १३४८, १३४९ गहरा झरना है। उसके चारों ओर मंदिर बने हैं। इसका पानी जब घटता है तो चंदन की लकड़ी के महेश्वर उवाच : रूप में महादेव प्रकट होते हैं।" द्रक्ष्यन्ति ये जनाः सर्वे काष्ठरूपं समास्थितम् । कदाचिद् द्विजशार्दूल सर्वकालं तु न द्विज ॥ कल्हण ने (रा० त० ७:१९०) कपटेश्वर का —1143 : १३५०, १३५१ उल्लेख किया है। राजा मुचकुंद यहाँ के जल से स्वस्थ हो गये थे। स्थानीय जनश्रुति है। जल में अयं च सततं नन्दी काष्ठरूपी गणो मम । विलक्षण स्वास्थ्यदायक शक्ति है। कथासरित्सागर दर्शनं दास्यते नृणां तदनुग्रहकाम्यया ॥ में सोमदेव भट्ट ने कश्मीर में जाकर शिव पूजा —1144 : १३५३ के माहात्म्य का वर्णन किया है। कपटेश्वर में शिव पूजा का उल्लेख करते हुए लिखता है— मां च दृष्ट्वा न यास्यन्ति स्वशरीरेण रुद्रताम् । 'सुरेश्वर्याद्रिपु तया विजये कपटेश्वरे' कपटेन च दास्यामि नराणां दर्शनं यदा (९:१:४८) —1145 : १३५४, १३५५, नीलमत पुराण में कपटेश्वर के संबंध में निम्न- तदा संज्ञामवाप्स्यामि कपटेश्वर इत्यतः । लिखित उल्लेख मिलता है— तोयस्य बहुलीभावो देशेऽस्मिन् ब्राह्मणोत्तम ॥ —1146 : १३५५, १३५६