भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 155, कुल 984 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 155

७२ राजतरंगिणी

डाक्टर श्री बरनियर ने सन् १६६५ ई० मे अपने संरक्षक दानिशमन्द खां के साथ यहाँ की यात्रा की थी। उनका वर्णन प्राचीन शास्त्रीय वर्णन से मिलता है। उसने यहाँ की भौगोलिक स्थिति का अध्ययन किया था। इस चमत्कार के कारण देने का भी प्रयास किया है। वह लिखता है—"मई मास मे जब बर्फ गलती है तो वह झरना ५ दिन तक दिन मे तीन बार चल कर बन्द हो जाता है। यह उषाकाल, मध्याह्नकाल तथा सायंकाल चलता है। लगभग ४५ मिनट झरना चलता है। उसमे से काफी पानी निकलता है। वह १० या १२ फुट वर्गाकार और उतने ही गहरे कुण्ड को भरने के लिए काफी होता है। वह झरना बन्द हो जाता है। वर्षा ऋतु में अन्य झरनों के समान निस्सन्देह इसमें पानी आ जाता है।" कुण्ड के समीप हिन्दुओ का एक मंदिर है। उसमे देवी की मूर्ति है। अतएव इस स्थान को संड कहते हैं। लोग पूजा निमित्त आते है। यहाँ के सम्बन्ध में अनेक गाथाएँ तथा कपोल कल्पनाएँ हैं। बरनियर लिखता है। मैं यहाँ ६ दिन इस चमत्कार को देखने के लिए रहा। मैने यहाँ के पर्वत का अच्छी तरह अध्ययन किया। पर्वत मूल में यह झरना स्थित है। मैं इस चमत्कार का कारण जांचने के के लिए चारों तरफ कदम कदम देखता पर्वत के ऊपर पहुँचा। यह पर्वत उत्तर से दक्षिण फैला है। दूसरे पहाड़ो से अलग है। इसका रूप गधे की पीठ की तरह है। यह लम्बा अधिक है। चोटी कठिनाई से १०० पद चौड़ी होगी। पूर्व की तरफ यह पहाड़ घासों से ढँका है। पश्चिम की तरफ वृक्ष तथा झाड़ियाँ हैं। दूसरी तरफ पहाड़ होने के कारण सूर्य की रोशनी इस पर आठ बजे प्रातः काल के पहले नही पड़ती। मैने विचार किया। संभव है। सूर्य की गरमी के कारण यह चमत्कार उत्पन्न होता है। मैं समझता हूँ। शीत काल में समस्त भूमि तुषाराच्छादित हो जाती है। पर्वत के उस भागमें जम जाती है जहाँ प्रातः कालीन उगते सूर्य की किरणें पड़ती हैं। बर्फ पिघलती है। जल झरने में जाता है। इसी प्रकार मध्याह्न काल में बर्फ पिघल कर धीरे-धीरे झरने में पहुँच जाती है। इसी प्रकार सूर्य की किरण जब पश्चिम की ओर झुकती है तो बर्फ गल कर दूसरे स्रोत में पहुंचती है। इस प्रकार सायंकालीन जल झरने में आ जाता है। सायंकालीन जल झरने मे इसलिए कम आता है कि पश्चिमी तरफ वाले पहाड़ पर वृक्ष तथा झाड़ियाँ लगीं है। उसके कारण सूर्य की किरणें इस तरफ बर्फ पिघलाने के लिए अधिक नही पहुँच सकतीं। पानी पन्द्रह दिनों में इसलिए समाप्त होकर बन्द हो जाता है कि पहले दिनों में पानी ज्यादा चलता है। धीरे-धीरे कम होता हुआ पन्द्रहवें दिन बन्द हो जाता है। बर्फ जो पर्वत में जमी रहती है यह धीरे-धीरे गलकर समाप्त होती रहती है। जल का आना एक-सा नही रहता। कभी दोपहर में अधिक आता है। कभी देखा गया है कि प्रातः काल अधिक आता है। कभी प्रातः काल अधिक तथा मध्याह्न काल में कम हो जाता है। इसका कारण यह है कि किसी दिन ज्यादा ठंडक होती है और किसी दिन कम; किसी दिन बादल आ जाने के कारण ठंडक बढ़ जाती है। और गर्मी असमान रूप से पड़ने लगती है।"—Berneirs Travels in the Mogul Empire, द्वितीय संस्करण, पृष्ठ ४१०-४१३. हरचरितचिन्तामणि मे वर्णन मिलता है। यदि कोई पापी इस स्थान पर आ जाय तो उसे निर्झर का आश्चर्यजनक कार्य नही दिखाई पडेगा (४:५०)। सिख गवर्नर कर्नल मियान सिंह यहाँ आये थे। निर्झर का चलना बंद हो गया था। उन्होने लम्बा उपवास किया। विचित्र निर्झर पुनः चलने लगा। नीलमत पुराण मे संध्या शब्द एक स्थान पर नदी और दूसरे पर पुष्करिणी के लिए व्यवहृत किया गया है। अतएव उन्हें एक नही मानना