राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग ८९ असंतापार्हतां जानन् यत्र पित्रा विनिर्मिते । गौरवादिव तिग्मांशुर्घत्ते ग्रीष्मेऽप्यतीव्रताम् ॥ ४१ ॥ ४१. भगवान् भुवन भास्कर अपने पिता काश्यप के प्रति आदर प्रकट करने के कारण उनके द्वारा निर्मित काश्मीर मण्डल को कष्ट न मिले, एतदर्थ ग्रीष्म¹ ऋतु की गरिमा काल में भी किरणों में तीव्रता नहीं लाते । विद्यावेश्मानि तुङ्गानि कुङ्कुमं सहिमं पयः । द्राक्षेति यत्र सामान्यमस्ति त्रिदिवदुर्लभम् ॥ ४२ ॥ ४२. उत्तुंग विद्या वेश्म,¹ कुंकुम², हिम जल, द्राक्षादि³ पदार्थ जो स्वर्ग में भी दुर्लभ हैं। यहाँ साधारण सुलभ हैं। उसका उपयोग नहीं किया जाता अपितु शीतकालीन निवास में परिणत कर काम में लाया जाता है। गरीब मुसलमान प्रायः मसजिदों के हमामो का प्रयोग करते हैं। इस प्रकार के हमामों का निर्माण बड़ी मसजिदों में है। बहुत से हमाम घाटों के किनारो पर बने रहते हैं। वहाँ गरम पानी स्नान निमित्त पहुँचाया जाता है। मालूम होता है । आजकल जैसी प्रथा कल्हण के समय में प्रचलित रही होगी। यही कारण है कि नदियों के वर्णन के साथ कल्हण ने इनका वर्णन दैनिक जीवन से सम्बन्धित होने के कारण किया है। मैंने कश्मीर के ग्रामों में बहुत भ्रमण किया है। सभी सरोवरों, तड़ागों, पुष्करिणियों, मागों अथवा जलाशयों के पास लकड़ी का चौकोर शिवालय नुमा बन्द स्नान-गृह रखा रहता है। वह हटाया- बढ़ाया जा सकता है। प्रथा अत्यन्त प्राचीन है। इतिहास लेखक प्रायः ग्रीस और रोम को स्नान प्रथा को श्रेय देते हैं। मुख्यतः हमाम शैली के स्नान को। भ्रम के कारण कुछ लेखक इस प्रथा का जनक उन्हें बताते हैं । टर्किश बाथ किंवा हमाम प्रथा का श्रेय तुर्कियों को दिया जाता है। वस्तु स्थिति यह नहीं है। कुस्तुनतुनियां को जब तुर्कों ने विजय किया तो वहाँ रोम तथा ग्रीक शैली के गर्म जल द्वारा परिचालित स्नानगृह थे। तुर्कों ने उनका नाम हमाम रख दिया। टर्किश बाथ, १२ टर्किश बाथ सोप इत्यादि स्नान सम्बन्धी प्रसाधनों के नाम प्रचलित हो गये। किन्तु कश्मीर में यह प्रथा बहुत समय पूर्व से प्रचलित थी। यह रोमन याय, टर्किश बाथ की नकल नहीं थी । पाठभेद : श्लोक संख्या ४१ में 'असन्तापार्हताम्' का पाठ भेद 'न्तापहृताम्' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ४१(१) कल्हण यहाँ पर कश्मीर मण्डल की रचना काश्यप द्वारा हुई थी उस ओर पुनः संकेत करता है। कश्मीर में कभी गरमी नहीं पड़ती यह निर्वि- वाद है। ग्रीष्म ऋतु में जब समस्त भारत तपने लगता है। पृथ्वी प्यासी रहती है। सभी स्रोत वरफ गलने से पूर्ण रूप से चलने लगते हैं। उस समय कश्मीर में पुष्प खिलते हैं। और वर्षा ऋतु में फल लग जाते हैं। गर्मी वहाँ क्यों नहीं पड़ती उसपर कल्हण ने उत्प्रेक्षा द्वारा एक प्राचीन पौराणिक धार्मिक गाथा की ओर संकेत किया है। पाठभेद : श्लोक संख्या ४२ में 'यत्र खा' का पाठ भेद 'यत्रासा' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ४२ (१) विद्या वेश्म : उत्तुंग विद्या वेश्म के उल्लेख से प्रकट होता है कि कश्मीर में विद्याध्ययन