राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग ९१ तत्र कौरवकौन्तेयसमकालभवात् कलौ । आ गोनन्दात् स्मरन्ति स्म न द्वापञ्चाशतं नृपान् ॥ ४४ ॥ ४४. कौरव एवं पाण्डवों के कलियुग १ समकालीन तृतीय गोनन्द के पूर्व हुए कश्मीर मण्डल के राजाओं का इतिहास लुप्त हो गया है । तस्मिन् काले ध्रुवं तेषां कुकृत्यैः काश्यपीक्षुजाम् । कर्तारः कीर्तिकायस्य नाभूवन् कविवेधसः ॥ ४५ ॥ ४५. उन राजाओं के पूर्व कुकृत्यों के कारण काश्यपी १ में कोई कृती कवि नहीं हुआ जो उनकी कीर्ति काया निर्माण निमित्त लेखनी उठाता । गिरिजा देवी पार्वती का नाम है । हिमाचल की कन्या मानी जाती है । किन्तु गोरी उस कन्या को कहते हैं जो आठ वर्ष की होती है । कुमारी होती है । ग्वारो कन्या देवी स्वरूप होती है । प्राचीन हिन्दू प्रथा के अनुसार इस प्रकार की कन्याओं को नवरात्र की नवमी को भोजन कराया जाता है । उनकी पूजा होती है । पूर्वीय उत्तर प्रदेश में इसको 'छोहरी' खिलाना कहते हैं । पाठभेद : श्लोक संख्या ४४ में 'भवात्कलौ' का पाठभेद 'भवान् कलौ' तथा 'गोनन्दात्' का 'गोनदत्' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ४४ (१) कलियुग : उपोद्घात, कश्मीर वर्णन के पश्चात् कल्हण इतिहास लिखने का प्रारम्भ इस श्लोक से करता है । इसका प्रारम्भ वह कश्मीर के बावन लुप्त राजाओं से करता है । उनका कोई सूत्र कल्हण को नहीं मिल सका । इतिहास सामग्री भी वह अपने समय में उनके विषय में नहीं प्राप्त कर सका । अतएव वह स्पष्ट कहता है कि गोनन्द (तृतीय) के पूर्व के बावन राजाओं की स्मृति लुप्त हो गयी है । कल्हण ने यहाँ 'गोनन्दात्' शब्द का प्रयोग किया है । गोनन्द प्रथम का उल्लेख उसने श्लोक संख्या १:१६ में किया है । गोनन्दात् शब्द यहाँ पर तृतीय गोनन्द के लिये प्रयुक्त किया गया है । ज्ञात राजाओं का नाम गोनन्द तृतीय से प्रारम्भ होता है । कल्हण ने अपने इतिहास का प्रारम्भ काल (वराहमिहिर के बृहद् संहिता से ) युधिष्ठिर के राज्यकाल से आरम्भ किया है । युधिष्ठिर के राज्याभिषेक तथा कथित समय का आधार कल्हण ने नीलमत पुराण को माना है । गोनन्द प्रथम कश्मीर का ऐतिहासिक पुराकालीन राजा रूप में चित्रित किया गया है । नीलमत पुराण के अनुसार गोनन्द पाण्डवों का सम कालीन था । राजा जनमेजय ने ऋषि वैशम्पायन से आश्चर्य चकित होकर पूछा कि नाना देश के राजाओं ने महाभारत में भाग लिया । क्या कारण है कि कश्मीर के राजा महाभारत युद्ध में किसी पक्ष की तरफ से भाग नहीं लिया । ऋषि वैशम्पायन ने राजा जनमेजय की शंका का समाधान किया है । उसी प्रसंग में कश्मीर के इतिहास का वर्णन किया है । वही कथोपकथन नीलमत पुराण का वर्तमान स्वरूप है । पाठभेद : श्लोक संख्या ४५ में 'कुकृत्यैः' का पाठभेद 'कुकृतैः' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : ४५ (१) काश्यपी : काश्यपी का यहाँ अर्थ कश्मीर है । अगय्या पृथ्वी के सताइस नामों में एक