भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 174

प्रथम तरंग ९३ भुजवनतरुच्छायां येषां निषेव्य महौजसां जलधिरशना मेदिन्यासीदसावकुतोभया । स्मृतिमपि न ते यान्ति क्ष्मापा विना यदनुग्रहं प्रकृतिमहते कुर्मस्तस्मै नमः कविकर्मणे ॥ ४६ ॥ ४६. उन महत्त्वशाली कवि कृति को सादर नमस्कार करता हूँ, जिनके अनुग्रह बिना उन प्रतापशाली राजाओं को जिनकी बलवती भुजा की छाया से समुद्र वेष्टित मेदिनी वनच्छाया तुल्य निर्भय थी। कोई स्मरण भी न करता । येऽप्यासन्निभकुम्भशावितपदा येऽपि श्रियं लेभिरे येषामप्यवसन् पुरा युवतयो गेहेष्वहश्चन्द्रिकाः । तांल्लोकोऽयमवैति लोकतिलकान् स्वप्नेऽप्यजातानिव भ्रातः सत्कविकृत्य किं स्तुतिशतैरन्धं जगत्त्वां विना ॥ ४७ ॥ ४६. जिनके पदों द्वारा हस्त मस्तक पद दलित होता था; जिन प्रसिद्ध प्राप्त के प्रासादों में कमनीय कामिनियों दिवा शशि के समान विहरती थीं; उन लोक तिलकों के अस्तित्व का स्वप्न में भी भला कवि कृति के बिना कौन स्मरण रखता ? ओ ! कवि बन्धु !! जिनके बिना यह जगत् अन्धकार में रहता उन आपकी शत-शत स्तुति क्यों न करूँ ।

भाषा में 'वड्डकहा', (संस्कृत वृहत्कथा) लिखा था। ग्रन्थ अनुपलब्ध है। उसका संस्कृत अनुवाद उपलब्ध है। क्षेमेन्द्र ने उसकी कथाओं को संस्कृत पद में संक्षिप्त कर लिखा है। इसके अतिरिक्त 'बोध-सत्त्वावदान' नामक अवदान की रचना भी इन्होंने की थी। क्षेमेन्द्र की 'नृपावली' अभी तक प्राप्त नही हुई है। उसके मिलने पर कश्मीर के इतिहास पर नवीन प्रकाश पड़ सकता है।

क्षेमेन्द्र कुलीन था। उसका समय सन् ९९० से १०९५ ई० तक था। उसकी शिक्षा बहुत अच्छी हुई थी। उसने विदेश भ्रमण किया था। शैव सम्प्रदाय का अनुयायी था। सोमपाद किंवा भागवत के साथ अध्ययन करने के कारण उसका झुकाव वैष्णव मत की ओर हो जाना स्वाभाविक था।

क्षेमेन्द्र ने बौद्ध धर्म का गम्भीर अध्ययन किया था। बौद्ध धर्म के विषय में उसकी धारणा ऊँची थी। 'नरमाला' संस्कृत साहित्य का उत्कृष्ट ग्रन्थ है। क्षेमेंद्र ने अपने समकालीन कायस्थ कर्मचारियों की कटु आलोचना की है।

समयमातृका में वर्णित स्थलों का पता आज भी कश्मीर में लगाया जा सकता है। क्षेमेन्द्र कवि रंगमंच का प्रेमी तथा नाटक देखने का शौकीन था। मुस्लिम काल में भारतीय रंगमंच का अराजकता, धार्मिक उन्माद तथा संरक्षण के अभाव में लोप हो गया। भारतीय कलाकार कश्मीर में आश्रय निमित्त आने लगे। नाट्यकला तथा रंगमंच कश्मीर में विक- सित होने लगे। कश्मीर में भी हिन्दू राज्य की समाप्ति तथा मुस्लिम राज्य के उदय के साथ नाटक तथा रंगमंच संरक्षणहीन हो गये। वे स्वतः लोप हो गये। कश्मीर की जनता के मुस्लिम हो जाने पर धार्मिक नाटकादि में रुचि नहीं रह गयी थी। 'कवि- कण्ठाभरण' में क्षेमेन्द्र लोगों को रंगशाला में जाने की सलाह देता है।