राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग १०७ प्राचीन कपिशा नगरी अफगानिस्तान में थी। उसका वर्तमान नाम बेग्राम है। यहाँ कपिशा नामांकित शिलालेख प्राप्त हुए हैं। कपिशा के उत्तर कंबोज है। यह पामीर की मध्येशिया स्थित अधित्यका है। कम्बोज के पूर्व तारिम नदी है। उसी के समीप कुचा प्रदेश है। गान्धार से प्राच्य तक के क्षेत्र में पाणिनि काल में संस्कृत भाषा प्रचलित थी। गान्धार, कपिशा, बाह्लीक एवं कम्बोज महाजनपद पाणिनि काल में भारत के उत्तर पश्चिम में थे। कम्बोज काशगर के दक्षिण का प्रदेश था। हिन्दूकुश के दक्षिण पूर्व में गांधार, दक्षिण-पश्चिम में कपिशा, उत्तर-पश्चिम बाह्लीक तथा उत्तर-पूर्व में कंबोज जनपद थे। गांधार को यूनानियों ने 'गन्दराई' नाम दिया है। उस समय यह प्रदेश तक्षशिला से कुनड़ नदी तक विस्तृत था। पश्चिमी गांधार की राजधानी पुष्कलावती थी। उसका सम्बोधन यूनानियों ने 'पिउकलावती' से किया है। वह स्थान स्वात कायुल नदी का संगम स्थान वर्तमान चारसदा है। मार- कण्डेय पुराण (५७ : ३९) में 'पुष्कला' जनपद का उल्लेख आया है। दार्वाभिसार गन्धार जुहुण्डर शकान् रम्मान्। तङ्गणान् मान्द्रवान् भद्रांश्चन्तर्गिरिर्बहिर्गीरीन् ॥ ४० : १२१, १२२ यह श्लोक नीलमत में किंचित् पाठभेद से पुनः मिलता है। दार्वाभिसार गान्धार जुहुण्डर शकाः खसाः । तंगणा माण्डवाश्चैव अन्तर्गिरिबहिर्गिरिः ॥ १३९ : १८२, १८३ गान्धार का एक नाग रूप से वर्णन मिलता है। उरुचः श्रोकणो वायुः शुको वैश्रवणो यमः । मण्डूकनासो गान्धारो नागः क्षूर्पारकिष्वनिः ॥ ४९४ : १०६४ गांधार देश के राजा आरब्ध का नाम भागवत पुराण मे, सेतुपुत्र का नाम विष्णु पुराण मे, शरद्वान का नाम वायु पुराण मे आया है। शकुनी भी गांधार के राजा थे। शकुनी दुर्योधन के मामा तथा महा- भारत युद्ध में शल्य के पश्चात् कौरव सेना के सेनापति हुए थे। गान्धार राज : शकुनी : पर्वतीय : उद्योग पर्व ३० : २७ मे उल्लेख मिलता है। गान्धार का राजा दुर्योधन का मामा शकुनी था। गान्धार के एक नग्नजित् राजा का एतरेय ब्राह्मण (७ : ३४) में उल्लेख आता है। उससे सोमविषयक ज्ञान प्राप्त हुआ था। सुबल राजा की कन्या गान्धारी थी। वह धृतराष्ट्र की पत्नी तथा दुर्योधन की माँ थी। गान्धारी किल पुत्राणां शतं लेभे वरं शुभा। इति शुश्राव तत्त्वेन भीष्मः कुरुपितामहः ॥ आदिपर्व : १०९ : ११ ततो गान्धारराजस्य प्रेषयामास भारत। अच्छन्निरिति सम्प्राप्तीन् सुबलस्य विचारणा ॥ ११० : १२ गान्धार-जातक तथा कुम्भकार जातक तथा बौद्धधर्म-ग्रन्थों में गान्धार का विशेष उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद १:२२६:७ तथा अथर्व वेद ५ २२.१४ में गांधार का उल्लेख आया है। इससे स्पष्ट है कि वैदिक काल से गान्धार का ऐतिहासिक महत्त्व था। इसकी प्रसिद्धि थी। वाल्मीकि रामायण में बाह्लीक, कम्बोज, दरद, चीन आदि हिमालय के पर्वतीय जनपद कह गये हैं। गान्धार का स्पष्ट उल्लेख रामायण में नहीं किया गया है। सम्भव है कि उस समय गाधार कम्बोज, शक, बाह्लीक, आदि क्षेत्रों के अन्तर्गत समझा जाता रहा होगा अन्यथा रामायण उसका उल्लेख करने में न चुकता। तत्र म्लेच्छान् पुलिंदांश्च, शूरसेनांस्तथैव च। प्रस्थलान् भरताँश्चैव कुरूंश्च सह मद्रकैः ॥ काम्बोजानथयवनांश्चैव शकानारट्टकानपि। बाह्लीकानुपिकांश्चैव पौरवानथ टंकणान् ॥