राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग १०९ तदाहवे विवाहोत्का विष्ण्यन्ते स्म पतिंवरा । आसोत्तद्युपुरन्ध्रीणां गान्धारेषु स्वयंवरः ॥ ६८ ॥ ६८. समरांगण में जब विवाहोत्सुक गान्धारकन्याएँ पति वरण निमित्त उदास होने लगीं तो उसी समय स्वर्ग रमणियों १ युद्ध स्थल में वीरों का स्वयं स्वयंवर करने लगीं । कथं कश्मीरको राजा नायातस्तत्र कीर्त्य । राजा कन्धार की लडकी की शादी का शोहरा दूर पाण्डवैर्धार्तराष्ट्रैश्च न द्यूतः स कथं नृप ॥ दराज के मुल्कों में फैल गया । बडे शान व शौकत 4 : 4 वाले राजे महाराजे उसके स्वयंवर में कन्धार काश्मीरमण्डलं चैव प्रधानं जगति स्थितम् ॥ हाजिर हो गये । श्रीकृष्ण जी ने भी किसी वजह से 5 : 5 इसमें शमूलियत जरूरी समझी । यह खबर सुनकर अथोपसिन्धुगान्धारविषयेऽभूत्स्वयंवरः । दामोदर जो अपने बाप के खून का प्यासा था एक यत्राहूताः समाजग्मु राजानो वीर्यशालिनः ॥ भारी फौज लेकर श्रीकृष्ण जी के मुकाबला के लिए 33 : २४ कन्धार रवाना हो गया । और साथ जंग व जदल तत्रागतं समाकर्ण्य वासुदेव स्वयंवरें । की बुनियाद डाली । राजा मजकूर श्रीकृष्ण के जगाम माधवं योद्धं चतुरंगलवान्वितः ॥ हाथों कतल हुआ । उसकी रानी जसोमती जो उन 6 : २५ दिनो हामला थी मशविरह श्रीकृष्णजी महाराज तत्र तस्याऽभवद्युद्धं वासुदेवेन धीमता । अपने खाविन्द की जानशीन हुई । मुद्दत हकूमत यादृशं वासुदेवस्य नरकेन सहाऽभवत् ॥ १३ साल । 7 : २६ पाठभेद : श्लोक संख्या ६८ में 'विष्ण्यन्ते' का 'विघ्नन्ति' ततः स वासुदेवेन सुयुद्दे विनिपातः ॥ तथा 'सोत्तु' का 'आसीत्त' पाठभेद मिलता है । 8 : २७ पादटिप्पणियाँ : अन्तर्वत्नीं तस्य पत्नीं वासुदेवोऽभ्यषेचयत् । ६८(१) यह एक प्राचीन गाथा है । आर्य जाति भविष्यत्पुत्रराज्यार्थं तस्य देशस्य गौरवात् ॥ में प्राचीन काल से पायी जाती है । सुरवालाएँ रण- 9 : २७-२८ स्थल में वीर योद्धाओंका वीर गति प्राप्त करने नीलमत पुराण में नाम बालगोनंद दिया पर वरण करती थीं । हिन्दू परम्परा के गया है । अनुसार वीर गति प्राप्त योद्धा स्वर्ग जाता है । अतः सा सुषुवे पुत्रं बालगोनन्द संज्ञिनम् । अतएव उसे वरण करने के लिए स्वर्ग की बालाएं वालभावात् पाण्डुसुतैर्नानीतः कौरवेनं वा ॥ उत्सुक रहती है । कल्हण इस ओर संकेत करता है । 10 : २८-२९ यूरोप मे स्केण्डेनेवियन गाथा के अनुसार युद्ध हसन लिखता है-'बाप के इन्तकाल के बाद व भूमि में वीर गति प्राप्त वीर को लेने के लिये रथों मशविरह अशकोन सलतन सन कलयुग से तोन साल पर सुरवालाएँ आती थी । उन्हें साथ लेकर स्वर्ग पहले यह शख्स तख्त हकूमत पर बैठा । रैयत को जाती थीं । अदल व अहसान के जरिए गुलाम बनाकर अक्सर उक्त पद का प्रथम आधा पद विरोधाभास व बेशतर राजे अपने मुतईम बनाये । इन्हीं दिनों प्रकट करता है ।