राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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मन्दिर समूह के समीप पहुँचते ही मार्ग का श्रम स्थान की अभिरामता के कारण तिरोहित हो जाता है। चारों ओर उत्तुंग शिखरमाला खड़ी मिलती है। पर्वतमालायें शिखर से मूल तक अत्यधिक हरित हैं। उनका दृश्य मन को मुग्ध कर देता है। विश्व में इतना सुन्दर पर्वतीय दृश्य दुर्लभ है। प्राचीन काल में वसिष्ठाश्रम (वैगथ) से लेकर मन्दिर समूह तक तपस्वियों के आश्रम थे। तीर्थ यात्रा पथ के दोनों ओर ब्राह्मण रहते थे। परन्तु इस समय यहाँ गूजरों की आबादी है। कृषि में मक्का यहाँ की मुख्य उपज है। गूजर हिन्दू तथा मुसलमान दोनों होते हैं। यहाँ के आबाद गूजर मुसलमान हैं। यह स्थान जंगल है। सम्भव है कालान्तर में पर्यटक-केन्द्र बन जाने पर पुष्ट और विकसित हो जाय। वन में भालू हैं। ये मक्का खा जाते हैं। उनसे रक्षा का विचित्र उपाय ग्रामीणों ने निकाल रखा है। शेर से भालू भय खाता है। शेर की आँखें अन्धकार में चमकती हैं। अतएव ग्रामीण दो स्थानों पर करीब-करीब आग जला देते हैं। दूर से मालूम होता है। शेर खड़ा है। उसकी आँखें चमक रही हैं। भालू भयभीत हो जाता है। समीप नहीं आता। शेर से भी सुरक्षा की तरकीब ग्रामीणों ने ने निकाल ली है। शेर आग से डरता है। ग्रामीण घास की ज्वाला प्रज्वलित करते हैं। शेर पास नहीं आता। भाग जाता है। सड़क निर्माण तथा पर्यटकों के आवागमन के कारण भालू तथा शेर से स्थान निरापद हो गया है। वे दूर जंगलों में चले गये हैं। सन् १८६९ में लेफ्टिनेण्ट कर्नल श्री हेनरी एच. कोल ने (सुपरिटेण्डेण्ट आर्केयालोजिकल विभाग उत्तर पश्चिम मंडल) अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'एन सिण्ट विल्डिङ्ग इन कश्मीर' लण्डन में प्रकाशित करवायी थी। वह उपलब्ध है। उसमें यहाँ के मन्दिर समूहों का चित्र दिया गया है। उस समय मन्दिरों की क्या अवस्था थी उन चित्रों के देखने से पता चलता है। श्री कोल ने यहाँ के मन्दिर समूहों को दो वर्गों में विभक्त कर उनका नामकरण किया है। एक का नाम राजदैन बल तथा दूसरे का नाम वन मन्दिर समूह रखा है। प्रथम मन्दिर समूह की संज्ञा राजदैन बल तथा पीछे वाले मन्दिर समूह को संज्ञा नागबल दिया है। बिशप कोब्री ने नागबल को पूर्वीय तथा राजदैन बल को पश्चिमी मन्दिर समूह कहा है। बिशप कोब्री के समय मन्दिरों पर घास, फूल बहुत जमे थे। (जे० एम० वी० १८६६ पृष्ठ १०१) पूर्वीय मन्दिर समूह अर्थात् नाग बल किंवा भूतेश मन्दिर के प्राकार की उत्तर पूर्व दिशा में एक छोटा सरोवर है। इस सरोवर को नारान नाग कहते हैं। नीलमत पुराण तथा कल्हण के अनुसार यह सरोवर प्रसिद्ध सोदर तीर्थ है। इस तीर्थ से बीस गज पश्चिम बड़े मन्दिर के प्राकार के बाहर उत्तरा- भिमुख एक और मन्दिर था। यह मन्दिर भैरव का मन्दिर था। नागबल अर्थात् पूर्वीय मन्दिर समूह में बड़ा मन्दिर शिव भूतेश का था। राजदैन बल अर्थात् पश्चिमी मन्दिर समूह में बड़ा मन्दिर शिव ज्येष्ठेश का था। इस मन्दिर के पश्चिम दक्षिण कोण बिशप कोब्री को शिवलिंग का अधिष्ठान दिया धरथा मिला था जिसपर शिव लिंग स्थापित किया जाता है। वह शिव अधिष्ठान ज्येष्ठेश का था। मैंने चारों ओर लगभग एक घण्टा तक उसे खोजा। परन्तु वह मुझे मिला नहीं। अतएव नहीं कह सकता कि उसका रूप क्या था। यदि वह मिल जाता तो शिव लिंग किस स्थान पर प्रतिष्ठित किया जाता है उसकी घेरे, गहराई तथा आकार से कल्पना की जा सकती थी कि शिवलिंग का प्रकार तथा आकार क्या था। कर्नल श्री कोल श्रीनगर से दो पड़ाव चलकर यहाँ पहुँचे थे। पहला पड़ाव १० मील तथा दूसरा