राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७८ राजतरंगिणी धर्माध्यक्षो धनाध्यक्षः कोशाध्यक्षश्चमूपतिः । दूतः पुरोधा दैवज्ञः सप्त प्रकृतयोऽभवन् ॥ ११९ ॥ ११९. राज्य में सप्तप्रकृति¹ अर्थात् धर्माध्यक्ष, धनाध्यक्ष, कोषाध्यक्ष, चमूपति, दूत पुरोधा, एवं दैवज्ञ केवल सात ही राज्याधिकारी थे। कर्मस्थानानि धर्म्याणि तेनाष्टादश कुर्वता । ततः प्रभृति भूपेन कृता यौधिष्ठिरीस्थितिः ॥ १२० ॥ १२०. राजाने अठारह कर्म स्थानों¹ को धर्मानुसार स्थापित किया। उसने महाराज युधिष्ठिर के राज्य समान स्थिति उस समय से राज्य में प्रचलित की। उनकी निष्क्रियता उनके नाश का राजनीतिक एवं धार्मिक दोनों दृष्टियों से कारण हुई। पाठभेद : श्लोक संख्या ११८ में 'मत्प्राप्तं' का 'मत्प्राप्ते' तथा 'राज्यं' वा 'राजा' पाठभेद मिलता है। पादटिप्पणियाँ : ११९ (१) सप्त प्रकृति : महाभारत सभापर्व पंचम अध्याय : अडतीसवें श्लोक में राज्य की सात प्रकृतियों का उल्लेख मिलता है। कच्चित् प्रकृतयः सप्त न लुप्ता भरतर्षभ । राजा के सात अंग किंवा प्रकृति स्वामी, मन्त्री, मित्र, कोष, राष्ट्र, दुर्ग, तथा सेना एवं पुरवासी हैं। राज्य की सप्त प्रकृतियों में दुर्गाध्यक्ष, बलाध्यक्ष, धर्माध्यक्ष, सेनापति, पुरोहित, वैद्य एवं ज्योतिषी की भी कहीं कही गणना की गयी है। कामन्दक नीतिसार में पुरातन भारतीय राज्य की प्रकृति का उल्लेख मिलता है। उसके अनुसार राज्य की सात प्रकृतियां—स्वामी, अमात्य, जनपद, दुर्ग, कोष, दण्ड एवं मित्र थे। स्वामी राज्य की प्रथम प्रकृति है। स्वामी शब्द के अन्तर्गत राजतंत्र का राजा तथा गणतंत्र का राष्ट्र-पति दोनों आ जाते हैं। स्वामी शब्द वर्तमान प्रच-लित शब्द सॉवरेन्टि किंवा सम्प्रभुत्व के अर्थ में प्राचीनकाल में प्रयुक्त किया जाता था। कौटिल्य राजा को स्वामी मानता है। वह राजतन्त्र में विश्वास करता था। स्वामी के चार गुण माने गये हैं—अभिगामिका, प्रज्ञा, उत्साह और आत्मसम्पद्। अमात्य के लिये कौटिल्य दो बातें आवश्यक मानता है। प्रथम उसे जानपद अर्थात् देश का नाग-रिक तथा उसमें दृढ़भक्ति होनी चाहिए। दृढ़भक्ति का अर्थ है, राष्ट्र के प्रति एकमात्र निष्ठा। शब्द का भाव अंग्रेजी शब्द लायल्टी में आ जाता है। परन्तु भक्ति शब्द अधिक व्यापक एवं उदार है। तृतीय प्रकृति जनपद है। इसका अर्थ राष्ट्र किंवा देश है। राष्ट्र में तीन गुणों का होना कौटिल्य ने आवश्यक माना है। शत्रु द्वेषो शक्यसम्पद् अर्थात् इतना शमित सम्पन्न होना चाहिए कि पड़ोसी राज्यों को नियन्त्रण में रख सके। तृतीय गुण उसे कर्म शील वर्षक अर्थात् कर्मशील तथा कृषी कार्य में निपुण होना आवश्यक है। उसका चौथा गुण भक्तिशील मनुष्यों से युक्त सेना है। जनपद को प्रजाभक्त, देश भक्त तथा शुद्ध होना चाहिए। राज्य की चौथी प्रकृति है दुर्ग। दुर्ग के अन्तर्गत सैनिक शक्ति आती है। प्राचीन काल में वाष्प तथा अणु परिचालित शस्त्र शल्य नहीं थे। दुर्ग का विशेष महत्व था। कौटिल्य चार प्रकार के दुर्ग का वर्णन करता है। वे जल, गिरि, मरुस्थल तथा अटवी दुर्ग है। दुर्ग उस समय राजधानी किंवा पुर होते थे। दुर्ग के अन्दर नगर बस जाता था। मुस्लिम काल में शहर पनाह तथा खाई नगर के चारो ओर बनायी जाती थी। ऊपर मोर्चेबन्दी होती थी। कहीं कहीं खाई और खाई के पश्चात् शहर पनाह दोनों बनायी जाती थीं। मनु दुर्ग के स्थान पर पुर शब्द का व्यवहार करते हैं। (मनु-स्मृतिः ९:५.२१४-)