भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 276

प्रथम तरंग १९१ प्रादुर्भूते ततस्तस्मिंस्तीर्थे कृतनिमज्जनः । स नन्दिरुद्रस्पर्धायां मानी पर्याप्तिमासदत् ॥ १२७ ॥ १२७. उस प्रादुर्भूत नवीन तीर्थ में मानी राजा ने स्नान किया तो उसे सोदर तीर्थ स्नान जैसी प्रसन्नता हुई । नन्दि रुद्र की स्पर्धा कार्य सम्पन्न होता देख उसे सन्तोष हुआ । तेन जातु परीक्षार्थं निक्षिप्तः सोदरान्तरे । सपिधानाननः स्वर्णशृङ्गारः सुचिरोदरः ॥ १२८ ॥ १२८. उस उत्पन्न सोदर तीर्थ को परीक्षा लेने के लिये कि वास्तव मे वह जल मूल सोदर तीर्थ का है या नहीं । राजा ने एक सुवर्ण शृङ्गार का मुख शीशा से बन्द किया । उसे मूल सोदर तीर्थ में छोड़ दिया । दिनद्वयेन सार्धेन श्रीनगर्युद्भूवाम्भसः । उन्मग्नः स महीभर्तुस्तस्य चिच्छेद संशयम् ॥ १२६ ॥ १२६. ढ़ाई दिन के पश्चात् वह सुवर्ण शृङ्गार श्रीनगर समीपस्थ उद्भूत सोदर तीर्थ मे निकल आया तो उस राजा का सन्देह दूर हो गया । नूनं नन्दीश एवासौ भोक्तुं भोगानवातरत् । दृष्टादृष्टक्रियासिद्धिर्न भवेत्तादृगन्यथा ॥ १३० ॥ १३०. प्रतीत होता था कि राजा स्वयं नन्दीश था । भूमि पर भोग भोगने के लिये अवतार लिया था अन्यथा इस प्रकार के अलौकिक कार्य किस प्रकार देखना सम्भव था ।


प्रवाह कर दिया गया है। और यही स्थान ज्येष्ठ रुद्र का स्थान था । पाठभेद : श्लोक संख्या १२६ में 'सोदरा' का 'मोदर', 'वर्णश्या' का पाठभेद 'वर्णरिवा' मिलता है। श्लोक संख्या १२८ में 'जातु' का पाठभेद 'तत्र' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : १२६. (१) मै बदायूँ उत्तर प्रदेश में एक समय गया था। बदायूं की पुरानी आबादी एक ऊँचे स्थान पर है । नगर में अनेक कूप है । मुझे बताया गया यदि एक कूप में सन्तरा छोड़ दिया जाय तो दूसरे कूप में निकल आता है । यही बात मुझे नैपाल में मालूम हुई। वहाँ गुह्येश्वरी देवी का मन्दिर है। मै दर्शन करने गया । वहाँ के कुण्ड के विषय मे यही कहा गया । समय-समय पर उसमें फल निकल आता था ।


कल्हण का यह वर्णन महत्त्वपूर्ण है। ढाई दिन में स्वर्ण शृंगार नवीन सोदर तीर्थ में निकल आया । यह दोनों स्थानो के मध्य की दूरी और यात्रा मे लगने वाले समय की ओर संकेत करता है। राजा की शक्ति की ओर भी संकेत करता है। स्वर्ण शृंगार को एक स्थान से दूसरे स्थान पहुँचने में ढाई दिन का समय लग गया । यद्यपि राजा राज कार्य की व्यस्तता के बावजूद प्रतिदिन सोदर तथा विजयेश्वर की यात्रा करता था । कल्हण राजा की अलौकिक शक्ति के वर्णन की भूमिका प्रस्तुत करते हुए निम्न- लिखित श्लोक में उसकी तुलना नंदीश से कर देता है । १३०. (१) अवतार : प्रायः सभी धर्म किसी न किसी रूप में अवतारवाद के सिद्धान्त को स्वीकार करते हैं । देवताओ का मनुष्य रूप धारण करना तथा मानवों से सम्पर्क स्थापित करना अनादि काल