राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 287, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ें१९८ राजतरंगिणी तस्मात्सत्त्वातिरेकस्ते मिषादेवं परीक्षितः । क्षीणपापाऽद्य संवृत्ता स्वस्ति ते साधयाम्यहम् ॥” १४५ ॥ १४५. 'राजन् ! मैंने रूप परिवर्तन द्वारा आपके सत्व की परीक्षा ली थी। आपके दर्शन द्वारा मेरे पाप क्षीण हो गये हैं। अब मैं जाती हूँ। स्वस्ति ! राजन् !' कृतप्रतिश्रवे राज्ञि विहारकृतये पुनः । प्रहर्षोत्फुल्लनयना कृत्यादेवी तिरोदधे ॥ १४६ ॥ १४६. राजा से विहार के पुनर्निर्माण का वचन लेकर प्रहर्षोत्फुल्लनयना कृत्या अदृश्य हो गयी।
'बौद्ध ग्रन्थों' के अनुसार महासम्मत शाक्यों के आदि राजा थे। महासम्मत से बुद्ध तक वंश कभी छिन्न नही हुआ था। वंशपरम्परा टूटी नहीं थी। वे सूर्यवंशी थे। उन्हें महासम्मत इसलिए कहा जाता था कि पृथ्वी पर जब अनाचार फैला तो जनता ने सर्व सम्मति से उन्हे राजा निर्वाचित किया था। महासम्मत के राज्य में ताड़ना, बहिष्कार, जुर्माना आदि दण्ड के प्रकार अज्ञात थे। एक मत है। महासम्मत मनु थे। श्रीलंका के राजा अपनी वंशा- वली महासम्मत से सम्बन्धित करते थे।
१४३ (१) प्रायश्चित्त : भगवान् बुद्ध की करुणा तथा क्षमा का वर्णन यहाँ कल्हण ने किया है। इन श्लोकों से प्रकट होता है। कल्हण ने स्वयं विहार उच्छेद के कार्यों को पसन्द नही किया था। राजा के चरित्र में कालिमा न लगे इसलिये उसने कृत्या द्वारा भगवान् स्वरूप बोधिसत्त्वों का सन्देश राजा को दिया। उसने दोष किया था। दोष किंवा पापों का निराकरण प्रायश्चित्त द्वारा हो सकता था। यदि विहार उच्छेद जैसे दोष के कारण मन स्ताप होगा तो वह भी दूर हो जायगा। प्रायश्चित्त का प्रकार भी कल्हण ने बताया है। जिसका नाश किया उच्छेद किया है उसे पूर्ववत् कर देने में दोष किंवा पाप का प्रायश्चित्त हो जाता है।
कल्हण ने यहाँ यह भी प्रकट किया है। राजा के पास हेम संभार अर्थात् प्रचुर स्वर्ण भण्डार था। उसका कोश खाली नही था। पूर्ण था। वह सुयोग्य राजा था। कोश बल पूर्ण था। राजा स्वर्ण भण्डार का दान देकर दान के पुण्य का भागी बन सकता था। बौद्ध धर्म में दान का बहुत महत्त्व है। बौद्ध साहित्य में विहार, चैत्य, वन, शालादि निर्माण कराने वालों की बड़ी प्रशंसा की गयी है। भगवान् बुद्ध ने जेतवन निर्माणकर्त्ता अनाथपिण्डक, पूर्वाराम निर्माणकर्त्री विशाखा, जीवक वन निर्माण कर्त्ता जीवक आदि की बडी प्रशंसा की है। यहाँ कल्हण इसी दान की ओर संकेत करता है। बोधिसत्त्व उसके अप- राधों को इस प्रकार क्षमा कर देंगे। इसे स्पष्ट रूप से यहाँ कहा गया है।
पाठभेद : श्लोक संख्या १४५ में 'पापा' का 'पापो' 'संवृत्ता' का 'संजाता' पाठभेद मिलता है।
१४५ (१) स्वस्ति : कल्हण ने यहाँ वैदिक शब्द स्वस्ति का प्रयोग कृत्या से कराया है। वह महत्त्व- पूर्ण है। बौद्ध धर्म वेद की मान्यता नही देता। उसकी परम्परा में विशेष आस्था नही रखता। कश्मीर में बौद्ध धर्म, वैदिक परम्परा तथा तत्कालीन हिन्दू धर्म से इतना प्रभावित हो गया था कि दोनो में भेद नाम मात्र का रह गया था। बुद्ध को अवतार मान लेने पर रहा सहा भेद भी नष्ट हो गया था। स्वस्ति का अर्थ कल्याण है। स्वस्ति शब्द का प्रथम उल्लेख ऋग्वेद (१:१:९;१:३५:१;२:३२:८;१०:८;३:३१: २१;२:३८:१;३:३८:९) में मिलता है। स्वस्ति वाचन भारतीय परम्परा है। स्वस्ति का अर्थ जाति