भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 289

२०० राजतरंगिणी विधाय सोऽश्मप्रासादं नन्दिक्षेत्रे क्ष्मापतिः । भूतेशाय समं कोशैः पूजां रत्नमयीं ददौ ॥ १४८ ॥ १४८. नन्दिक्षेत्र १ में राजा ने अश्म प्रासाद भूतेश २ निमित्त निर्माण कराया। उसने कोश के साथ ही साथ रत्नों ३ द्वारा भगवान् की विधिवत् पूजा की । सामग्री मिल सकती है। इस समय यहाँ के समीपवर्ती क्षेत्र मे सैनिक कैम्प लगे हैं । पाकिस्तान से रावल- पिण्डी श्रीनगर आने वाली यही मुख्य सड़क हैं। इस सडक पर बहुत लड़ाइयाँ हो चुकी हैं। उनके स्मारक भारतीय सुरक्षा विभाग ने स्थान-स्थान पर बनवा दिये हैं। यहाँ के शेष पत्थर आदि कुछ ही दिनों में विकास योजनाओ मे लुप्त हो जायेंगे । ग्राम का प्राचीन रूप बदल गया है । जलोक शैव था । जाति पांति हीन संघ एवं समाज की जो स्थापना बौद्धों द्वारा हो रही थी वह पुनः वर्णाश्रम आधारित समाज की ओर मुड़ रही थी, राजा शैव होने पर भी कृत्या के नाम पर कृत्याश्रम विहार की स्थापना किया था । निस्सन्देह वह विहार ग्यारहवी शताब्दी तक कायम था । कल्हण के समय चाहे इसका पूर्व गौरव लुप्त हो गया था परन्तु विहार एवं स्तूप का आकार शेष था । क्षेमेन्द्र अपनी पुस्तक समयमातृका (सन् १०५०) में नायिका कंकाली को इस विहार में ठहराता है। इससे भी स्पष्ट है कि क्षेमेन्द्र काल में वह विहार निवास करने योग्य था और उसका पूर्व गौरव लुप्त नही हुआ था । बोध मूल ग्राम कृत्याश्रम के समीप है। जहाँ पर बौद्ध कालीन वस्तुएँ पाई जाती है। बारहमूला के समान कहा जाता है कि यहाँ भगवान् ने निवास किया था । बारहमूला से कृत्याश्रम की ओर चलने पर हुष्कपुर, गाण्डव विहार, आदि प्राचीन स्थानों के क्षेत्र मिलते हैं । महाभारत में कृतिकाश्रम एक तीर्थ का वर्णन मिलता है । अनुशासन पर्व में विस्तृत उल्लेख मिलता है। महाभारत तथा कल्हण वर्णित कृत्याश्रम दोनो ही जलाशय के पास थे । (म० अनु०; २५:२५) महाभारत में कृत्या का उल्लेख मिलता है । दैत्यों ने आभिचारिक यज्ञ द्वारा एक राक्षसी को उत्पन्न किया था। वह आमरण अनशनकारी दुर्योधन को उठाकर रसातल ले गयी थी। (म. वन : २५२: २१-२०) भीष्म पर्व महाभारत मे कृत्या नामक एक नदी का भी उल्लेख मिलता है। (९:१८) महाभारत वर्णित आश्रम तथा कृत्याश्रम दो भिन्न स्थान प्रतीत होते हैं । अनुसन्धान का विषय है । (३) कृत्या उपासना : राजा की सहिष्णुता की यहाँ पराकाष्ठा दिखाई गयी है। जिस कृत्या ने राजा का मांस मांगा था, जिसने बौद्धो के उच्छेद से राजा को विरत किया था, जिसने राजा का स्वयं बोधिसत्त्व अर्थात् ईश्वर रूप दर्शन कर, तप क्षम किया था, उसे ही राजा ने देवी मानकर उसकी स्मृति में कृत्याश्रम विहार का निर्माण कराया था । राजा चाहे कट्टर वर्णाश्रम धर्मानुयायी क्यों न रहा हो, उसने इस घटना के पश्चात् अपनी उग्रता शिथिल कर दी थी। उसके विचारों में परिवर्तन हुआ था । अन्यथा जिस बौद्ध धर्म को उच्छिन्न करने पर तुला था, ठोस कदम उठाया था, उसी के प्रति आदर प्रकट कर विहार का निर्माण न कराता । इससे यह बात प्रकट होती है कि राजा सभी पन्थो के प्रति आदर करता था। आज कल के हिन्दुओं के समान सभी देवी देवताओ को उपासना तथा पूजा करने में संकोच नही करता था। पाठभेद : श्लोक संख्या १४८ में 'सोऽश्म' का 'गोप्य' 'समं' का 'समा'; 'कोशैः' का 'कोषैः'; पूजा का 'प्रभां' पाठभेद मिलता है ।