भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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प्रथम तरंग २३९ ज्योतिषियो के अनुसार नागार्जुन की आयु केवल ७ दिनो की थी । उसके माता-पिता के धर्माचरण के कारण देवताओ ने उसको ७ सप्ताह बढा दिया । तत्पश्चात् पुनः आयु ७ वर्ष बढा दिया । सात वर्ष पूर्ण होने के पूर्व वह नालन्द बिहार में विद्याध्ययन निमित्त भर्ती किया गया वहाँ उसने अमितायु की पूजा आरम्भ की । देवता प्रसन्न हो गये । उसकी आयु ३०० वर्षों की हो गयी । उसको मृत्यु के सम्बन्ध में विचित्र कथा है । उसने स्वयं अपना मस्तक अपने हाथों से काटकर मृत्यु का आलिंगन किया था । कहा जाता है । नागार्जुन आन्ध्र प्रदेश के गन्तूर जिला में श्रीपर्वत पर रहते थे । कालान्तर में इसे विजयपुरी तथा नागार्जुन कोंडा कहने लगे । जन- श्रुति है । राजा शातवाहन के समय नागार्जुन ने काशी छोड़ने के पश्चात् श्रीपर्वत पर अपना निवास स्थान बनाया । कश्मीरी बौद्ध भिक्षु तथा बौद्ध धर्मानुयायी वहीं की यात्रा करने लगे । नागार्जुन कोण्डा में भगवान् बुद्ध की धातु एक स्तूप में पायी गयी है । उस स्तूप मे भगवान् की धातु एक गोले सुवर्ण मंजूषा मे मिली थी । सन् १९३३ में यह धातु महाबोधि संग्रहालय सारनाथ वाराणसी में केन्द्रीय सरकार ने सुरक्षित रखने के लिये दे दिया है । मैं प्रातः प्रतिवर्ष कार्तिक पूर्णिमा मे भगवान् के इस पवित्र धातु का दर्शन करता हूँ । यह धातु मूल गन्धकुटी विहार में सुरक्षित है । यहाँ के खनन कार्य में बडे स्तूप, विहार, मन्दिर, मूर्तियो, लघु स्तूप, देहली, अधिष्ठान आदि अमरावती शैली के प्राप्त हुए है । प्राकृत अभिलेख ब्राह्मी लिपि में दूसरी तथा तीसरी शताब्दी के मिले हैं । वहाँ एक अर्धचन्द्रा- कार देवस्थान (संख्या २) नागार्जुन कोण्डा में दान देने वालों की तालिका अंकित मिली है । समीपवर्ती स्थानों में श्रीलंका, गांधार, चीन तथा कश्मीर के पर्यटकों तथा यात्रियों के लिये स्थान बनाने का उल्लेख है । नागार्जुन की एक मूर्ति नालन्द के खनन कार्य सन् १९१९–१९२० में प्राप्त हुई है । स्वर्गीय श्री राहुल सास्कृत्यायन तिब्बत से कुछ चित्र लाये थे । उनमें एक नागार्जुन का है । यह इस समय पटना संग्रहालय बिहार मे सुरक्षित है। रानी शांतिश्री ने अनेक चैत्य तथा विहारों का निर्माण नागार्जुन कोंडा में कराया था । एक अन्य उपासिका बोधिश्री ने चैत्यगृह वहां बनवाया था । उनमें विदेश तथा कश्मीर के भिक्षु आकर रहते थे । चीनी अनुवादों में उसके १८ ग्रन्थों का उल्लेख बुनियु नंजियो ने अपनी तालिका में दिया है । नागार्जुन ने 'सुहृल्लेख' अर्थात् अपने उन पत्रों का संग्रह किया था, जिसे उन्होंने पत्र स्वरूप अपने मित्र यज्ञश्री गौतमीपुत्र को लिखा था । नागार्जुन की जीवनी का अनुवाद चीनी भाषा मे कुमार जीव ने सन् ४०५ ई० में किया था । नागार्जुन का तिब्बती नाम है क्लुसग्रुव । प्राकृत आख्यायिका लीलावती के अनुसार नागा- र्जुन पोट्टिस तथा कुमारिल के साथ शातवाहन की राजसभा मे रहते थे । नागार्जुन सिद्ध हस्त लेखक थे । उनकी रचना शैली तथा युक्ति विश्व साहित्य में प्रसिद्ध है । माध्यमिक कारिका नागार्जुन के पाण्डित्य, विद्वत्ता, तर्कबुद्धि, दार्शनिक विचार तथा उसके व्यावहारिक ज्ञान का उत्कृष्ट उदाहरण है । नागार्जुन शून्यवाद का आचार्य है । वह कहता है : न सन् नासन् न सदसत् न चाप्यनुभयात्मकम् । चतुष्कोटिविनिर्मुक्तं तत्त्वं माध्यमिका विदुः ॥ नागार्जुन की दृष्टि में मूलतत्त्व शून्य है । किसी भी पदार्थ का स्वरूप निर्णय करने में चार ही कोटियो का प्रयोग संभाव्य हैं । पहला अस्ति है । दूसरा नास्ति है । तीसरा तदुभयम् चौथा नोभयम् है । परमार्थ इन चारो कोटियों