भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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२६४ राजतरंगिणी आचान्ते शुचितां प्राप्ते कृतासनपरिग्रहे । ततश्च वीजयन्पर्णतालवृन्तैरभाषत ॥ २१४ ॥ २१४. भोजनोपरान्त जल से शुद्ध होकर, उनके आसन ग्रहण करने पर विशाख पत्र ताल वृन्त (पंखा) से हवा करता हुआ बोला । भवत्यौ पूर्वसुकृतैः कैश्चित्संप्राप्तदर्शनः । चापलाद्विप्रसुलभात्प्रष्टुमिच्छत्ययं जनः ॥ २१५ ॥ २१५. पूर्वकृत सत्कर्मों से आप दोनों का दर्शन प्राप्त हुआ । अब विप्रसुलभ चपलता के कारण यह जन' कुछ पूछना चाहता है । कल्याणिनीभ्यां कतमा पुण्या जातिः परिष्कृता । कुत्र वा क्लान्तमेतादृग्विरसं येन भुज्यते ॥ २१६ ॥ २१६. 'कल्याणिनी आप दोनो ने कहाँ और कौन सी पुण्य जाति को अलंकृत किया है ? जिसके कारण इस प्रकार के क्लान्त एवं नीरस वस्तु को खाती हैं।' एका समूचे विद्ध्यावामस्य सुश्रवसः सुते । स्वादु भोक्तव्यमप्राप्तं किमीदृङ् नोपभुज्यते ॥ २१७ ॥ २१७. उनमें से एक ने कहा—हम सुश्रवा नाग की कन्या हैं। सुस्वादु' वस्तु के अभाव हम क्या यह भी न खाएँ ? [बायाँ स्तम्भ] पादटिप्पणियाँ : २१३ (१) पुटक : यहाँ पर पत्तो के दोनों से अर्थ है । विशाख ने समीपवर्ती कमल पत्र अथवा किसी अन्य वृक्ष किंवा पौधे के पत्तो से दोना बनाकर उनमें कन्याओ को जल पीने के लिये दिया । २१४ (१) तालवृन्तः : ताल पंखा अर्थ यहाँ लगता है । प्रतीत होता है । कश्मीर के दक्षिण पंजाब, उत्तर प्रदेश तथा दक्षिणापथ में प्रचलित ताल अर्थात् ताड़ के पंखों का प्रचलन हो गया था । २१५ (१) जन : कुछ विद्वान् अनुवादको ने 'जन' का अनुवाद आप का विनम्र सेवक' किया है । मैंने यहाँ मूल जन शब्द ही रख दिया है । जन शब्द प्रचलित है । बोधगम्य है । कल्हण ने प्रकृत जन शब्द प्रायः जन साधारण के लिये प्रयोग किया है । पाठभेद : श्लोक संख्या २१६ में 'परिष्कृता' का ० ' मिलता है । [दायाँ स्तम्भ] २१६ (१) प्रश्न : कल्हण की प्रश्न शैली कालिदास की शकुन्तला नाटक शैली जैसी है । नाटक के प्रथम अंक में कण्व के आश्रम की युवतियों तथा दुष्यन्त के बीच हुए प्रश्नोत्तर का स्मरण कराती है । निष्कर्ष निकाला जा सकता है । कल्हण ने इतिहास के साथ ही साथ साहित्य संस्कृत एवं काव्य का यथेष्ट अध्ययन किया था । यह शैली ऋग्वेद में उर्वशी और पुरुरवा के संवाद तथा यम-यमी के प्रश्नोत्तर में भी मिलता है । पाठभेद : श्लोक संख्या २१७ मे 'प्राप्त' का पाठभेद 'प्राप्य' तथा 'मप्राप्य' मिलता है । पादटिप्पणियाँ : २१७ (१) सुस्वादु : कल्हण ने बड़ी ही सरल, मर्मस्पर्शी शैली तथा भाषा मे कन्याओं की दयनीय दशा का चित्रण किया है । स्वादिष्ट भोजन के अभाव में जो कुछ मिल जाय वही बहुत कुछ है ।