राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(रा० २ : १३४), रणादित्य ने माहेश्वर रणेश्वर (रा० : ३ : ४३९-३५४) रानी रणा रम्भा ने रणा स्वा (रा० ३ : ४५४), रानी अमृत प्रभा ने अमृतेश्वर (रा० ४६३) विक्रमादित्य ने विक्रमेडवर (रा० ३ ४७४) एवं उसकी रानी बिम्बा ने बिम्बेश्वर (रा० ३ : ४८२) का निर्माण कराया था। निर्माणकर्त्ताओं ने अपना नाम चिरस्थायी करने के लिए अपने नामों पर मन्दिरों का नाम रखा था। कुछ मन्दिरों के ध्वं सावशेष आज भी दिखायी पड़ते हैं। उनका यथास्थान वर्णन किया गया है। विष्णु मन्दिर : प्रथम तथा द्वितीय तरंग में किसी विष्णु मन्दिर के निर्माण का उल्लेख नहीं मिलता महाभारत काल किंवा लौकिक सम्वत् ६२८ से रणादित्य के काल लौकिक सम्वत् ३२९९ अर्थात् २६७ वर्षों तक विष्णु मन्दिर बनने अथवा पूजा का उल्लेख सार्वजनिक रूप में नहीं मिलता। तृतीय तरंग के अन्ति चरण में रानी रणारम्भा द्वारा विष्णु मन्दिर निर्माण का प्रथम उल्लेख मिलता है। विष्णु प्रतिमा का भी प्रथम बार उल्लेख यहीं किया गया है। (रा० ३ : ४४६) यह विष्णुपूजा एवं विष्णु मन्दिरों के निर्माण के इतिहास की ज्ञात बातों से सर्वथा सम्मत है। रानी रणा रम्भा दक्षिण समुद्र तट से काश्मीर में आयी थी। समुद्र तट पर गम के सेतुबन्ध, लंका विजय तथा रामायण की गाथायें अत्यधिक प्रचलित थी और आज भी हैं। दक्षिण-पूर्व एशिया तक रामायण पहुँच चुकी थी। उसकी गाथायें लोकप्रिय हो गयी थीं। दक्षिण से सम्बन्धित होने के कारण ही रानी रणारम्भा विष्णुपूजा से प्रभावित थी। काश्मीर में विष्णु मन्दिर बना कर उसने अपनी रुचि तथा मत का परिचय दिया। शिवलिंग : कल्हण ने शिव मन्दिरों के साथ ही साथ शिव लिंगों की स्थापना का वर्णन किया है (रा० २ : १२८-१३२)। शिव लिंग के अतिरिक्त प्रतिमा लिंग की भी चर्चा कल्हण करता है। षेडा भेदा, (रा० २ : १३५) हिर्मालग (रा० २ : १३७) शैललिंग (रा० ३ : ४१९) रत्नलिंग (रा० ३ : ४४६) तथा प्रजापति पूजित लिंग (रा० ३ : ४४६) अर्चना का विस्तृत उल्लेख करता है। जातियों का ज्ञान : भारत भ्रमण काल, सीमावर्ती ज्ञान तथा भारत पर मुसलिम आक्रमण होने के कारण अनेक जातियों के काश्मीर में आ जाने के कारण उसमें कल्हण को जातियों के रीति-रिवाज, कर्म आदि का पर्याप्त ज्ञान हो गया था। जो जातियाँ महाभारत पुराण, रामायण में अलौकिक मालूम होती हैं वे वास्तव में मानव जातियाँ थीं। भारत निवासी थी। कल्हण ने इसे अपने उल्लेखों तथा उनके कर्मों से सिद्ध किया है। उनका चित्रण अलौकिक मानव की अपेक्षा चलते-फिरते साधारण जनों के समान दिया है। यक्ष, गन्धर्व, विद्यार, सिद्ध, गुह्यक, शबर किरात, राक्षस को पुरातन ग्रन्थकारों ने जाति लोकोत्तर मान लिया था। महाभारत ने अपने काल तक की ज्ञात जातियों का कल्हण ने उल्लेख किया है। (द्रष्टव्यः परिशिष्ट) दक्षिणा पथ के चोल, कर्णाट, कोंकण, लाट, सौराष्ट्र, जातियों का भी वर्णन किया है। (रा० १ : ३००, ३ : ४३२) कल्हण ने विशेष उल्लेख जमुना से गान्धार प्रदेश तथा काश्मीर की सीमान्त जातियों का दिया है। श्रीकृष्ण-गोनन्द युद्ध के सन्दर्भ में वृष्णि तथा यादवों का उल्लेख किया गया है। काश्मीर की उत्तर दिशा में गुह्यक, यक्ष तथा दरद थे। (रा० १५६, १५६, ३१२) दक्षिण दिशा में गान्धार, गदा एवं दूर्व थे। (रा० १ ६६, ३१७) पूर्व-उत्तर दिशा में भोट्ट थे। (रा० १ ३१२) पूर्व-दक्षिण दिशा में किन्नर थे। (रा० १ १९९) पश्चिम दिशा में यवन, म्लेच्छ एवं आयों के अतिरिक्त अन्य जातियाँ थीं। आर्य का अर्थ कल्हण ने हिन्दुओं से लगाया है। म्लेच्छों में मुसलमानों के साथ ही साथ अफगान, ईरान तथा तुर्किस्तान की जातियाँ थीं। (रा० १ : ३१२) किरात पर्वतीय जंगलों में रहने वाली जाति