राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७४ | राजतरङ्गिणी सम्बन्धायोग्यमपि तं कृतज्ञतवशीवदः । संविभेजे स भुजगः कन्यया च धनेन च ॥ २४३ ॥ २४३. यद्यपि यह विप्र सम्बन्ध के अयोग्य था, तथापि कृतज्ञता द्वारा वशीभूत, उस 'भुजंग' ने कन्या एवं धन के साथ उसे भेजा। एवं नागवरात्प्राप्तप्रियस्तस्य द्विजन्मनः । महान् नरपुरे कालोऽगान्निभोगोपभोगयोः ॥ २४४ ॥ २४४. नाग द्वारा वर में प्राप्त स्त्री के साथ उसने 'नरपुर' में निभोगों द्वारा बहुत समय व्यतीत किया। भुजगेन्द्रतनूजाऽपि तं पतिं पतिदेवता । अतोषयत्परार्थ्यश्रीः शीलाचारादिभिर्गुणैः ॥ २४५ ॥ २४५. भुजगेन्द्र की यह अनुपम सौन्दर्यवती कन्या, पति को देवता' मानती हुई शील एवं आचारादि गुणों से संतुष्ट रखती थी। तस्यां कदाचिन्निर्याताग्रास्थितायां प्राङ्गणाद्बहिः । आतपायोञ्छितं धान्यं बुभुजे विहगन्दयः ॥ २४६ ॥ २४६ किसी समय जबकि चन्द्रलेखा अपने सौधाय पर स्थित खड़ी थी, प्रांगण के बाहर सुखायन के लिये डाले गये धान्य' को विहरता एक अश्व आकर खाने लगा। तं वारयितुमाहूता भृत्या नासन्गृहे यदा । शिञ्जानमञ्जुमञ्जीरा सा तदाऽवातरत्स्वयम् ॥ २४७ ॥ २४७. उसे हटाने के लिये चन्द्रलेखा ने भृत्यों को पुकारा परन्तु वे घर में नहीं थे। तब 'शिञ्जान मंजु मंजीरा' यह स्वयं नीचे उतरी।
एतेषां पूजनं कार्य बह्नन्नसुगुणाक्षरैः । सकता था तथापि कृतज्ञता तथा वचनबद्धता के फलं वेदान्तथा ज्ञात्वा नागपञ्चम्य वारयन् ॥ कारण चन्द्रलेखा को उसने कुल परम्परा तोड़ कर 627:७४५-७४६ विशाख ब्राह्मण को दे दिया था। वद्वितीर्थं चन्द्रतीर्थं नागतीर्थं तथैव च। २४५ (१) देवता : देव से तल् प्रत्यय होकर चक्रतीर्थं वामनं च गोप्रदानफलं लभेत् ॥ देवता बनता है। देव तथा देवता शब्द समानार्थक 1317 = १५३९ नहीं थे। देवता शब्द स्त्रीलिंग है। उसका प्रयोग पाठभेद : केवल मंत्रों के सम्बन्ध में होता रहा है। प्रत्येक वेद श्लोक संख्या २४२ में 'श्रुतवरं' का पाठभेद मन्त्र के साथ उसके देवता का नाम निर्दिष्ट रहता है। 'श्रुतं वरं' मिलता है। हिन्दी में देवता शब्द का व्यवहार देव शब्द के पादटिप्पणियाँ : समान पुल्लिंग में होने लगा है। देव वर्ग का निवास २४३ (१) भुजंग : सुश्रवा नाग यद्यपि स्वकुल स्वर्ग है। देव का पर्याय सुर होता है। देव, दिव्य परम्परा के अनुसार कन्या दान द्विज को नही कर धातु से बना है। इसका अर्थ चमकना है। प्रकाश- मान एवं रोजस्वी लोग देव कहे गये हैं।