राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०० राजतरंगिणी स जातु देवीं संवीतसिंहलांशुककञ्चुकम् । हैमपादाङ्कितकुचां दृष्ट्वा जज्वल मन्युना ॥ २९४ ॥ २९४. किसी समय रानी को 'हैमपादांकित' सिंहल देशीय कंचुकी धारण किये देखकर, जिसका अंकित पद रानी के कुच पर पड़ता था, वह क्रोध से प्रज्वलित हो उठा।
२५९:२४) पार्वती के शाप के कारण मृत्यु लोक में इसने मनुष्य योनि प्राप्त की थी। बेताल की भक्ति देखकर शिव एवं पार्वती भी महेश एवं शारदा नाम से पृथ्वी पर अवतीर्ण हुए थे। (शिव० शत १४)। कालिका पुराण में बेताल के भाई का नाम भैरव दिया गया है। वे राजा चन्द्रशेखर तथा रानी तारा के पुत्र थे। वे पूर्व जन्म में भृङ्गी एवं महा- काल नामक शिवदूत थे। भृङ्गी बेताल हुआ था। महाकाल ने भैरव का रूप लिया था। कामाख्या देवी की उपासना द्वारा उन्हें शिव गणों का नेतृत्व प्राप्त हुआ था। इनके वंशजों को 'वैताल वंश' कहते हैं। वैताल जननी स्कन्द की एक अनुचर मातृका थी। (म० शा० ४५:१३) प्रेत का एक प्रकार भी बेताल कहा जाता है। शव पर अधिकार कर लेता है। पाठभेद : श्लोक संख्या २९४ में 'सिंहलां' का 'सिङ्घाल द्वीप' तथा 'हैम' का पाठभेद 'हेम' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २९४ (१) हेमपादांकित : कंचुकी महि लायें पहनती हैं। पुराने समय में चोली पहनती थीं। स्तन के भीतर से रूमाल और आजकल पेटी कोट से कसती हैं। उसपर कंचुकी अथवा चोली या जंपर पहनती हैं। कुच स्थान पर किमी पुष्प गोलाकार आकृति किया कुछ न कुछ बेल बूटा बना देती हैं। इसी प्रकार स्वर्ण पाद अंकित चिन्ह कुच स्थल पर बन जाता था। आज कल भी बेल-बूटों में उँगलियां, हाथ, पंजा, मुखाकृत, मनुष्याकृति, पशु पक्षी की आकृति, बनायी जाती हैं। कुछ इसी प्रकार का स्वर्ण जरी का ब्लाउज कंचुकी अथवा चोली का कपड़ा उन दिनों श्री लंका किंवा सिंहल में बनता रहा होगा। इस वर्णन से एक बात का और पता लगता है। सिंहल से कश्मीर का व्यापार होता था। सिंहल के व्यापारी कश्मीर तथा कश्मीर के व्यापारी सिंहल को वस्तुओं का व्यापार करते थे। अन्यथा श्रीनगर से श्री लंका अथवा सिंहल दो हजार मिल दूर पड़ता है। वहाँ का वस्त्र कैसे कश्मीर में उपलब्ध हो सकता है। निःसन्देह मिहिरकुल तथा प्राचीन काल मे कश्मीर का व्यापार समृद्ध था। कश्मीर में भारत के कोने कोने से व्यापारी आते थे और कश्मीर से भी चारों ओर जाते रहे होंगे। पादांकित शब्द एक अनुमान की ओर अनायास ले जाता है। मिहिरकुल के समय मे सिंहल के सभी लोग बुद्धमतावलम्बी हो चुके थे। आज भी वे बौद्ध हैं। सिंहल अर्थात् श्री लंका मे आदम पीक अर्थात् शिखर है। उस पर चरण चिन्ह है: बौद्ध उसे बुद्ध, हिन्दू विष्णु तथा ईसाई महात्मा आदम का चरण चिन्ह मानते हैं। बाइबिल गाथा के अनुसार वे मानवों के आदि पुरुष थे। उन्ही से जगत् के मानवों की सन्तति हुई है। वे चाहे आज विभिन्न वर्ण, रूप, जाति एवं भाषाभाषी क्यों न हों। वैष्णव बैरागी लोग रामनामी ओढ़ते हैं। वह कई प्रकार की होती हैं। किसी पर राम, किसी पर शिव का नाम छुपा रहता है। इसी प्रकार भगवान् विष्णु का यह चिन्ह, शंख, गदा, चक्र तथा पद्म भी छपे रहते हैं। ललाट बाहु हृदय पर विष्णु पद छाप चन्दन, कस्तूरी, रोरी