भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 423, कुल 984 में से

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पृष्ठ 423

६१० राजतरंगिणी स तंत्रान्यं नृपं दत्त्वा तीव्रशक्तिरुपाहरत् । पटं यमुपदेवाख्यं मार्ताण्डप्रतिमाङ्कितम् ॥ २९६ ॥ अर्थात् तीव्र शक्तिमान राजा ने सिंहल का सिंहासन दूसरे नृप को देकर, वहाँ से मार्त्तण्ड प्रतिमांकित यमुप देव नामक वस्त्र लाया । हस्तिमात्रांश्च महाकायाः पाषाणांश्च महाबलाः । पर्वतांश्च समुत्पाट्य यन्त्रैः परिवहन्ति च ॥ २२:६० । समुद्रं शोभयामासुर्निपतन्तः समन्ततः । सूत्राण्यन्ये प्रगृह्णन्ति ह्यायतं शतयोजनम् ॥ २२:६२ । पाषाणांश्च गिरिशृङ्गान् गिरीणां शिखराणि च । दृश्यन्ते परिधावन्तो गृह्यदानवमन्निभाः ॥ २२:६६ । पञ्चमेन तथा चाह्ना प्लवंगैः क्षिप्रकारिभिः । योजनानि त्रयोविंशत् सुवेलमधिकृत्य वै ॥ २२:७२ । उक्त उल्लेख से पाँच बातें सिद्ध होती हैं। १. शिलाखण्ड विशाल थे। जैसे वे आज भी 'पम्बन' पुल के नीचे पड़े हैं। २. दूसरी बात पर्वतों तथा अन्य स्थानों से उन्हें यन्त्रों द्वारा लाया जाता था। वह इतने बड़े थे कि मानव-यत्न किंवा बानरी शारीरिक शक्ति के परे की बात थी। ३. तीसरी बात महत्त्वपूर्ण यह है कि पुल पाँच दिनों में बनकर तैयार हो गया। ४. चौथी बात महत्त्वपूर्ण है। खम्भा या तासा नहीं बनाया गया था । सर्वत्र उल्लेख मिलता है। शिला- खण्डों से पाट दिया गया था। वह बात 'पम्बनम्' में किसी प्रकार के निर्माण न मिलने के कारण स्पष्ट होती है । पाँचवीं बात, निर्माण में सूत्र का प्रयोग किया गया था कि पुल सीधा बने । सूत्राण्यन्ये प्रगृह्णन्तं ह्यायतं शतयोजनम् ॥ २२:६२ । यद्यपि मूल एक सौ योजन लम्बा बाँधा गया था। परन्तु सेतु केवल २३ योजन लम्बा बाँधा गया था । यह बात श्लोक संख्या २२:७२ के 'योज- नानि त्रयोविंशत्' से प्रकट होती है। एक सौ योजन लम्बा सेतु बाँधा गया था परन्तु पुल तेईस योजन ही क्यों बाँधा गया और वह भी केवल पाँच दिनों में। इन बातों में मेल नहीं खाता । यदि एक योजन आठ मील का मान लिया जाय तो लंका और भारत के मध्य समुद्र का पाट ८०० मील होना चाहिए । परन्तु शुद्ध पाट केवल २० मील का है। यदि सेतु २३ योजन लम्बा था तो १८४ मील लंका और भारत के मध्य दूरी होनी चाहिए । यह भी गलत होता है। 'पम्बनम्' पुल की लम्बाई देखकर यह समझा जा सकता है कि निर्माण में विशेष दिन नहीं लग सका । केवल 'पाँच दिन' के उल्लेख से प्रकट होता है कि पुल ८०० या १८४ मील लम्बा नहीं हो सकता । कवि वर्णन एवं सेतु की विशालता दिखाने के लिये यह वर्णन किया गया है। एक योजन चार कोस का होता है। एक कोस दो मिल का होता है। परन्तु काश्मीरी कोस दो मिल तथा ढ़ाई मिल के बीच होता था । प्रचलित कोस की दूरी से कम था । उक्त प्रमाणों तथा 'पम्बनम्' में बड़े विशालकाय शिलाखण्डों को देखकर सेतु का वही होना प्रमाणित होता है। यहाँ तटपर मुसलमान माझियों तथा ईसाइयों की आबादी है। कुछ निम्न वर्ण के हिन्दू रहते हैं। उनसे मैंने 'मिहिरकुल सम्बन्धी पुरानी कहानी किंवा आख्यायिका जानने का प्रयास किया। परन्तु उन्हें आश्चर्य हुआ । उन्होंने मिहिरकुल का नाम भी नहीं सुना था । वे केवल रामायण वर्णित गाथा को ही कुछ हेर फेर के साथ बता सकने में समर्थ हुए। पाठभेद : ... श्लोक संख्या २९६ में: 'शक्तिरुपा' शक्ति म।

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