भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 503

३७२ राजतरंगिणी निकुंभ ने वाराणसी नष्ट होने का शाप दिया । तालजंघादि दैत्यों ने वाराणसी नगर ध्वस्त किया । दिवोदास पलायन कर गया । अन्त में निकुंभ की पुनः स्थापना की गयी । वाराणसी समृद्धिशाली हो गयी । इस कथा में वर्णित निकुंभ ही गणपति नाम से प्रख्यात हुए । ( वायु० : ९२ : ३९-५१ ) गणेश ओंकार स्वरूप हैं । उनकी उपासना का अर्थ ब्रह्म की उपासना मानी गयी है । (गणेश० : १ : १३-१५ ) एतदर्थ सर्व विद्या एवं कलाओं का उन्हें अधिपति माना जाता है । किसी भी देवता की उपासना के पूर्व सर्वप्रथम गणेश की पूजा की जाती है । (पद्म० : सृ० : ९३ ) अ-उ-म् से ओंकार बनता है । यह प्रणव है । तुरीय नाम चतुर्थ भाग भी ॐ कार में समाविष्ट है । जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति तथा तुरीय चारों अवस्थाओं का ॐ कार द्योतक है । वाच्य तथा वाचक दोनों रूपों से ॐ कार वर्णित है । अतएव वेदों का ॐ कार से प्रारम्भ करने की प्रथा प्रचलित हुई थी । कालान्तर में गजमुख गणेश का स्वरूप ॐ कार से ही विकसित हुआ । ॐ कार तथा गणेश की प्रचलित एवं प्राचीन मूर्तियों के रूपों में साम्य मिलता है । गणेश की गजमुख मूर्ति अबतक पांचवीं शताब्दी के पूर्व की नहीं प्राप्त हो सकी है । सन्त ज्ञानेश्वर ने गीता की ज्ञानेश्वरी टीका में गजमुख तथा ॐ कार की एकता स्पष्ट की है । इस एकता के कारण उपनिषद् प्रतिपादित ॐ कार वेद एवं सार्वत्रिक, सर्व कार्यारम्भ में आद्य स्थान प्राप्त कर लिया । बाल गणपति, तरुण गणपति, भक्ति विघ्नेश्वर, शक्ति गणेश, उच्छिष्ट गणपति, नृत्त गणपति, हेरंब गणपति, प्रसन्न गणपति आदि रूपों में गणपति की मूर्तियाँ मिलती हैं । इसी प्रकार विनायक के आठ रूपों की कल्पना की गयी है । (३) अर्धनारीश्वर : एक कथा है । बाइबिल के आदम तथा हौवा की कथा से मिलती है । बाइ- बिल के अनुसार सर्व प्रथम आदम को भगवान् ने बनाया । तत्पश्चात् उसकी एक पसली से हौवा को बनाया । इस प्रकार मानव एक ही मनुष्य का अंग है । शिव पुराण में कथा मिलती है । ब्रह्मा ने प्रजा उत्पत्ति निमित्त तपस्या की । शिव उसकी तपस्या से प्रसन्न हो गये । उनके शरीर से अर्द्ध- नारी-नरेश्वर उत्पन्न हुए । ( शिव० स० १०१ ) स्कन्द पुराण में एक और कथा का वर्णन है । महिषासुरमर्दिनी ने महिषासुर का वध किया । शिव संतुष्ट हुए । प्रसन्न हुए । मन्दराचल पर पार्वती तपस्या कर रही थीं । पार्वती को वामांग पर शिव ने ले लिया । शंकर के इस प्रेम प्रदर्शन से प्रफुल्लित होकर, पार्वती भगवान् शंकर के वामांग में लीन हो गयीं । शंकर एवं पार्वती एक ही शरीर के दक्षिण तथा वामांग हो गये । शिव का शुद्ध दक्षिणांग शुक्लवर्ण रह गया । पार्वती का शरीर वामांग ताम्रवर्ण युक्त हो गया । अर्धभाग में कंचुकी तथा हार आदि आभूषण रह गये और यथावत् पुरुष स्वरूप रह गया । यह शिव पार्वती का अर्ध नारीश्वर किंवा अर्धनारी-नरेश्वर रूप हो गया । (स्कन्द० १ : २ : ३-२१; मत्स्य० २६०) मनुस्मृति में भी इसी प्रकार की एक कथा दी गयी है । हिरण्यगर्भ को सृष्टि रचना की इच्छा हुई । उसने अपने शरीर को दो भाग किये । अर्ध भाग से स्त्री तथा दूसरे अर्ध भाग से पुरुष शरीर की रचना हुई । एक ही शरीर के दो अंश थे । मिलने पर, अर्ध नारीश्वर रूप अर्थात् पुरुष तथा स्त्री एक में हो गये । ( मनु० : १ : ३२ ) देवी भागवत में और एक कथा इसी से मिलती- जुलती दी गयी है । ईश्वर अपनी स्वेच्छा से विविध रूप हो गये । दायां भाग पुरुष तथा वाम भाग स्त्री का हो गया । उसने यह कार्य सृष्टि रचना की दृष्टि एवं इच्छा से किया । (दे० भा० २ : २७ ) किष्किन्धा काण्ड वाल्मीकीय रामायण में इस